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आ. तस्दीक़ साहब,
दूसरा शेर ..हुस्न-ए-मतला है ... अत: तेल का ही आयेगा ... तेल को कहने से क्या हासिल होगा?...
सानी मिसरे में दिये का ज़िक्र है जो बात मुकम्मल कर रहा है ..
सादर
मुहतरम जनाब समर कबीर साहिबआदाब, खूबसूरत ग़ज़ल हुई है दाद के साथ
मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ -------शेर 2 के उला मिसरे में बात साफ नहीं हो पाई
''गर मयस्सर घी नहीं है,तेल का रोशन करें '' या तेल को रोशन करें -----सादर
आली जनाब समर साहब आदाब सबसे पहले तो आपके तहे दिल से मशकूर ओ ममनून हूँ कि आपने मुझा नाचीज को अपनी गलज नज्र की इस नवाजिश के लिये तहे दिल से शुक्रिया ये नजराना मेरे लिये बहुत मायने रखता है आपकी मुहब्बतों के लिये बहुत बहुत शुक्रिया । स्नेह ऐसे हीबनाए रखें ।
और गजल की बात करें इस मिसरे पर बहुत ही मश्क की है हमने भी तो इसकी बहर और रदीफ से दो चार हुए है । आपने जिस खूबसूरती से जफर साहब की जमीन पर मतला और दीगर अश्आर कहें है वो काबिले तारीफ है गिरह ही सादगी बरबस ही ध्यान खींचती है । इस बाकमाल गजल के लिए आपको दिली मुबारक बाद और दाद पेश करते है । सादर
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