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ग़ज़ल....रूप लम्हों में बदलती ज़िन्दगी का क्या करूँ

2122 2122 2122 212
रूप लम्हों में बदलती ज़िन्दगी का क्या करूँ
हौसलों का क्या करूँ चीने जबीं का क्या करूँ

रंग लाती ही नहीं अश्कों दफ़न की कोशिशें
आँख में आती नज़र रंजो ग़मी का क्या करूँ

​​रो रही है रात गुमसुम चाँद तारे मौन है
आग अंतस में लगाये चाँदनी का क्या करूँ

ओढ़ चादर कोहरे की कपकपाते होंसले
हर कदम पे थरथराते आदमी का क्या करूँ

हों इरादे आसमां तो जुगनुओं से रोशनी
आप घर खुद ही जलाये रोशनी का क्या करूँ

गुनगुनायें गीत कैसे औ कहें कैसे ग़ज़ल
जो समझ आती नहीं तो शायरी का क्या करूँ

चीने जबीं-माथे की सलवट
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Views: 975

Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 19, 2017 at 4:54pm
बहुत बहुत आभार आदरणीय सुरेन्द्र जी..सादर
Comment by नाथ सोनांचली on May 19, 2017 at 3:47am
आद0 ब्रजेश कुमार जी सादर अभिवादन, उम्दा गजल के लिए बधाई स्वीकारें
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 18, 2017 at 9:54pm
आदरणीय लक्षमण जी सुन्दर शब्दों में उत्साहवर्धन के लिए ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ...सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 18, 2017 at 9:53pm
उचित है आदरणीय अनुराग जी सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 18, 2017 at 9:49pm
जरूर आदरणीय महेंद्र जी..रचना पटल पे आपकी उपस्थिति स्वागतयोग्य है..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 18, 2017 at 9:48pm
आदरणीय गिरिराज जी आपकी अमूल्य सलाह के लिये ह्रदय से अभिनन्दन वंदन..सादर
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 18, 2017 at 12:05pm

आ. भाई बृजेश जी , सुंदर गजल हुई है हार्दिक बधाई ।

Comment by Mahendra Kumar on May 17, 2017 at 9:43am

अच्छी ग़ज़ल है आदरणीय बृजेश जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. गुणिजनों की बातों पर ध्यान दीजिएगा. सादर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 16, 2017 at 9:33pm

आदरणीय बृजेश भाई , अच्छी लगी आपकी गज़ल , बधाइयाँ स्वीकार करें । गुणिजनो की सलाहों पर गौर कीजियेगा ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 16, 2017 at 4:56pm
अभी नेटवर्क में न होने के कारन आपका लिंक ओपन नहीं कर पा रहा हूँ..

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