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ग़ज़ल --- बचपन था कोई झौंका सबा का बहार का ( दिनेश कुमार )

221____2121____1221____212

बचपन था कोई झौंका सबा का बहार का
लौट आए काश फिर वो ज़माना बहार का

खिड़की में इक गुलाब महकता था सामने
बरसों से बन्द है वो दरीचा बहार का

ख़ुशबू सबा की, ताज़गी-ए-गुल, बला का हुस्न
दिल के चमन को याद है चेहरा बहार का

अर्सा गुज़र गया प लगे कल की बात हो
उस बाग़े-हुस्न में मेरा दर्जा बहार का

दौरे-ख़िज़ाँ में दिल के बहलने का है सबब
आँखों में मेरी क़ैद नज़ारा बहार का

कलियाँ को बाग़बाँ ही मसलता है जब कभी
रोता है जार जार कलेजा बहार का

मर्ज़ी पे गुलसिताँ की भला कब है मुनहसिर
आना बहार का या न आना बहार का

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Ravi Shukla on July 7, 2017 at 11:42am
आदरणीय दिनेश जी बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही आपने । शेर दर शेर मुबारक बाद हाज़िर है । समर साहब्बके सुझाव से मिसरों में और भी खूबसूरती आ गई है । बधाई ।
Comment by रामबली गुप्ता on July 6, 2017 at 5:33pm
भाई दिनेश कुमार जी उम्दा ग़ज़ल हुई है। बधाई स्वीकारें। आद0 समर भाई साहब के सुझावों से सहमत हूँ।
Comment by नाथ सोनांचली on July 2, 2017 at 2:53pm
आद0 दिनेश जी सादर अभिवादन। गजल पर दाद के साथ मूबरकबाद कबूल फरमायें।
Comment by दिनेश कुमार on July 2, 2017 at 11:14am
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय समर सर जी। आपकी मुहब्बतों को दिल से सलाम सर ।
जल्द ही मिसरे आपके अनुसार दुरुस्त करता हूँ सर। नवाज़िश।
Comment by Samar kabeer on July 1, 2017 at 1:55pm
जनाब दिनेश कुमार जी आदाब,ग़ज़ल अच्छी हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले का ऊला मिसरा:-
'बचपन था कोई झोंका सबा का बहार का'
इस मिसरे में 'सबा'शब्द भर्ती का है, इस मिसरे को यूँ किया जा सकता है :-
"बचपन था या कि था कोई झोंका बहार का"
तीसरे शैर में भी भर्ती के शब्द हैं,इस शौरा को यूँ किया जा सकता है :-
'कलियों का हुस्न,ग़ल की महक,तितलियों का रक़्स
है याद मुझको आज भी चहरा बहार का'
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 1, 2017 at 12:15pm
खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय दिनेश जी

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