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रिम झिम रिम झिम बारिश होने लगती है

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़

यारों में जब रंजिश होने लगती है
चुपके चुपके साज़िश होने लगती है

आँखों में जब सोज़िश होने लगती है
रिम झिम रिम झिम बारिश होने लगती है

बाबू जी का साया सर से उठते ही
धरती की पैमाइश होने लगती है

तुम जब मेरे साथ नहीं होते जानाँ
मुझ पर ग़म की यूरिश होने लगती है

मुझसे कोई काम अटक जाता है जब
उनको मेरी काविश होने लगती है

जब जब भी मैं नाम तुम्हारा लिखता हूँ
हाथों में क्यूँ लरज़िश होने लगती है

बच्चे ग़ुरबत को क्या समझें उनकी तो
रोज़ नई फ़रमाइश होने लगती है

मुझसे कोई भूल "समर" हो जाये तो
महशर जैसी पुरसिश होने लगती है

---

रंजिश :- दुश्मनी
साज़िश :- षडयंत्र
सोज़िश :- जलन
पैमाइश :- माप (नपती)
यूरिश :- हमला
काविश :- तलाश
लरज़िश :- कम्पन्न
ग़ुरबत :- ग़रीबी
महशर :- महाप्रलय के बाद ईश्वर जिस मैदान में हर इंसान से उसके कर्मों का हिसाब लेगा ।
पुरसिश :- पूछताछ (जवाब तलबी)
___

समर कबीर
मौलिक/ अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on March 12, 2019 at 7:30am

जनाब अनीस शैख़ साहिब आदाब,ग़ज़ल आपको पसंद आई लिखना सार्थक हुआ,ग़ज़ल में शिर्कत और दाद-ओ-तहसीन के लिए आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।

Comment by Md. Anis arman on March 11, 2019 at 3:21pm


जब जब भी मैं नाम तुम्हारा लिखता हूँ
हाथों में क्यूँ लरज़िश होने लगती है

वाह्ह्ह्ह बेहतरीन सर क्या ग़ज़ल है क्या लय है हर शेर स्कूल कि एक एक कक्षा  कि तरह है जिसमें कुछ नया सीखते हैं ,गूँगा भी गुनगुनाने लग जाये इस ग़ज़ल में क्या कवाफ़ी है समंदर से मोती चुन के लाये हैं  आप और उसे गूथकर इस पटल पर मुझ जैसे नौसिखिए के लिए सजा कर रख दिए हैं आने वाले दिनों में न  जाने कितने लोग इस ग़ज़ल में डूबकर इसका मज़ा लेंगे और सीखेंगे, बहुत  बहुत मुबारकबाद सर 

Comment by Samar kabeer on September 17, 2017 at 9:40pm
जनाब अफ़रोज़'सहर'साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Afroz 'sahr' on September 17, 2017 at 9:26pm
वाह वाहहहहह जनाब समर साहब बेहतरीन ग़ज़ल के लिए ढेरों बधाई
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 17, 2017 at 9:23pm

सादर धन्यवाद आदरणीय भाई जी | मुझे लग तो रही थे २२ २२ २२ २२ २२ २ है , पर कंफ्यूज हो रही थी | पुनः धन्यवाद आपका भाई जी |

Comment by Samar kabeer on September 17, 2017 at 9:18pm
बहना कल्पना भट्ट जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
क्षमा मांगने की क्या बात है ।फेलुन यानी 22मेरी ग़ज़ल की गिन्ती है 22 22 22 22 22 2
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 17, 2017 at 9:13pm

आँखों में जब सोज़िश होने लगती है
रिम झिम रिम झिम बारिश होने लगती है

बाबू जी का साया सर से उठते ही
धरती की पैमाइश होने लगती है बहुत खूब भाई जी | जी भाई जी क्षमा चाहूंगी |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 17, 2017 at 9:11pm

आदरणीय भाई जी फ़ेलुन की गिनती क्या २२ होती है ? यह जो ग़ज़ल आपने लिखी है उसकी गिनती क्या २२१ है ?

Comment by Samar kabeer on September 17, 2017 at 8:55pm
बहना कल्पना भट्ट जी आदाब,बहुत बहुत शुक्रिया आपका,लेकिन आपने जो अशआर पसन्द किये हैं वो इस ग़ज़ल के नहीं,मेरी दूसरी ग़ज़ल के हैं ।
Comment by Samar kabeer on August 5, 2017 at 5:07pm
जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,आपकी प्रतिक्रया पाकर मुग्ध हूँ,ये मेरे लिये बहुत बड़ा सम्मान है कि आपने मेरी इस ग़ज़ल को अपने ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ से नवाजा और इस पर दोबारा तशरीफ़ लाये और मेरी ग़ज़ल का मान बढ़ाया,इस स्नेह के लिए दिल की तमाम तर गहराइयों के साथ शुक्रगुज़ार हूँ आपका ।

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