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ग़ज़ल
1222 1222 1222 1222

जो लड़कर आँधियों से जीत का इनआम लेता है
ज़माना फ़ख्र से उसका युगों तक नाम लेता है

सहारा जो यहाँ हर डूबते इन्सां का बन जाये
खुदा भी हाथ उसका मुश्किलों में थाम लेता है

दुआओं की कमी होती नहीं उसको कभी यारों
बज़ुर्गों का यहाँ जो हाल सुबहो-शाम लेता है

पता सबको है मुश्किल की घड़ी होती बहुत छोटी
कहाँ हर आदमी हिम्मत से लेकिन काम लेता है

खुदा को भी शिकायत होगी शायद अपने बन्दे से
कि वो है खुदग़रज़ दुख में ही उसका नाम लेता है

उसे होती नहीं है रास्ते की मुश्किलों की फ़िक्र
पहुँचकर ही जो मंज़िल पर 'बली' आराम लेता है

-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by रामबली गुप्ता on July 6, 2017 at 4:32pm
सादर आभार ब्रजेश कुमार जी
Comment by रामबली गुप्ता on July 6, 2017 at 4:31pm
समर भाई साहब आपकी सराहना से लिखना सार्थक हुआ। आपका सुझाव भी विचारणीय है। हृदय से आभार आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए।
Comment by रामबली गुप्ता on July 6, 2017 at 4:29pm
शुक्रिया आद0 सुरेश कुमार जी
Comment by रामबली गुप्ता on July 6, 2017 at 4:28pm
प्रतिक्रिया और सराहना के लिए सादर धन्यवाद आद0 आरिफ़ जी
Comment by रक्षिता सिंह on July 5, 2017 at 4:46pm
बहुत खूबसूरत...✍
Comment by Sushil Sarna on July 5, 2017 at 2:54pm

नही सर पे दुआओं की कमी होती उसे यारों,
यहाँ माँ बाप का जो हाल सुबहो शाम लेता है।

बहुत सुंदर आदरणीय रामबली जी .... इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई सर।

Comment by नाथ सोनांचली on July 5, 2017 at 5:43am
जनाब रामबली गुप्ता जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 4, 2017 at 9:38pm
बहुत बेहतरीन ग़ज़ल हुई सादर
Comment by Samar kabeer on July 4, 2017 at 2:34pm
जनाब रामबली गुप्ता जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
पांचवें शैर के ऊला मिसरे में 'अपने बंदे से'की जगह "ऐसे बंदे से'करना उचित होगा ।
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on July 4, 2017 at 1:33pm
बहुत सुंदर रचना आदरणीय, हार्दिक बधाई।

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