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लो आ गया सावन ( कविता)

लो आ गया फिर से सावन 

संग लाया यादें मन भावन 

नदी का किनारा अमरुद का पेड़,

पत्थर उठाकर तुम्हारा करना खेल 

पानी उछालना , फिर हंस देना 

अमरुद तोड़ खुद ही खा लेना 

थी अठखेलियाँ वो जो तुम्हारी 

बस गयी तब से साँसों में हमारी

उछलते छीटों  से खुद को भी भिगौना 

गीले होकर रूठ कर बैठ जाना 

कीचड़ लगाकर फिर भाग जाना 

पेड़ की आड़ से फिर मुस्कुराना 

शैतान सी हंसी , मस्ती की इच्छा 

आँखों में प्यार , लबों पर गुस्सा 

याद आतीं है हर वो बातें 

भले बीत गयीं है कितनी ही रातें 

बदला समय , बदल गयी है दुनिया 

चल दिए तुम बढाकर जो दूरियाँ 

आज भी नदी वहीँ बहती होगी 

करीब हो तुम उसके तुम्हे देखती होगी  

उन्ही बहती धाराओं से पूछलो 

खुद अपनी यादों से ही पूछलो 

लो फिर आ गया है सावन 

दिल में प्यार जगा रहा है सावन |

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 20, 2017 at 11:27pm
Ji Adarniya Giriraj ji prayas karungi is rachna ko sudhar sakun . Sadar

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 20, 2017 at 11:37am

आदरणीया कल्प्ना जी , गीत पर अच्छा प्रयास हुआ है , पंक्तियों मे कलों का निर्वहन न हो पाने से गेयता मे कमी है -- त्रिकल के बाद त्रिकल शब्द लेना चाहिये और द्विकल के बाद द्विकल या चौकल को गेयता सहीं आती है --

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 18, 2017 at 7:30pm
Adab aadarniya samar bhai ji ..sadar dhanywad . Ji edit kar dungi. Maafi chahti hoo kuch Vyastata ke chalte patal par nahi aa payi thee par parso lagbhag sabhi posts padhi aur pratikriya dene ka prayas kiya hai. Bhai ji jis nadi ka chitran kiya hai uske aage ek jharna bhi hai .. par aap sahi keh rahe hai upar jab nadi ka zikr hua hai to niche bhi wahi hona chahiye. Kuch samay bitiya sasural se mayke aayi hui thee . Phir uski pratham shadi ki saaligarh me vyast ho gayi thee. Prayas karungi apni upasthiti darz karva saku patal par niyamit taur par. Sadar.
Comment by narendrasinh chauhan on July 18, 2017 at 4:07pm

 सुन्दर रचना 

Comment by Samar kabeer on July 18, 2017 at 2:56pm
बहना कल्पना भट्ट जी आदाब,सावन की यादों में डूबी अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
10वीं पंक्ति में 'गिले' को "गीले" कर लें ।
16वीं पंक्ति में 'बित' को "बीत" कर लें ।
एक बात और कविता की शुरुआत में नदी का ज़िक्र है, और अंत में वो झरना कैसे हो गई,देखियेगा ।
एक बात ये कि अभी तक आपने अपनी पिछली रचना पर आई प्रतिक्रयाओं के जवाब भी नहीं दिये ?
Comment by Mohammed Arif on July 18, 2017 at 7:49am
आदरणीया कल्पना भट्ट जी आदाब, सावन को याद करते सहज अभिव्यक्ति की आपने । बहुत ही सहज । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । कुछ वर्तनीगत अशुद्धियाँ हैं ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 17, 2017 at 10:00pm
अच्छी कविता की कोशिश हुई है..बधाई
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 17, 2017 at 8:42pm
Dhanywad AAdarniya Mohit ji
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 17, 2017 at 8:41pm
Dhanywad AAdarniya Mohit ji
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on July 17, 2017 at 8:31pm
मुहतर्मा कल्पना साहिबा ,सावन के रंगों को आपने अच्छा उकेरा है कविता में ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें

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