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कभी गम के दौर में भी हुई आखें नम नहीं पर- लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

गजल
2121    1221    1212    122

मेरे  रहनुमा  ही   मुझसे  मिले  सूरतें  बदल  के
भला क्या समझता तब मैं छिपे पैंतरे वो छल के।1।
न सितारे बोले  उससे  मेरा  हाल क्या है या रब
न ही चाँद आया मुझ तक कभी एकबार चल के।2।

खता क्या थी अपनी ऐसी अभीतक न समझा हूँ मैं
जो था राज मेरे दिल का खुला आँसुओं में ढल के।3।
कहूँ लाल कह के  उसने न  गले  लगाया क्यों मैं
न लिपट सका था मैं ही कभी उससे यूँ मचल के।4।

बड़ा ख्वाब  था  खिलाऊँ  उसे मोल की भी रोटी
न खरीद पाया नितनित चढ़ा भाव जो उछल के।5।
इतिहास  का  असर भी हुआ  करता है सुना था
नहीं साथ मेरे फिर क्यों भला काम मेरे कल के।6।

कभी गम के दौर  में  भी हुई आखें नम नहीं पर
रही साथ खुशियाँ तो अब तेरे अश्क यारा छलके।7।
तेरे अश्क कर  रहे  हैं  तेरे  दिल का आशकारा
मेरे रतजगों पे तू फिर मढ़े दोष क्यों उबल के।8।

मौलिक व अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’


गजल
2121    1221    1212    122

मेरे रहनुमा  ही  मुझसे  मिले  सूरतें  बदल के
भला क्या समझता तब मैं छिपे पैंतरे वो छल के।1।
न सितारे बोले  उससे मेरा हाल क्या है या रब
न ही चाँद आया मुझ तक कभी एकबार चल के।2।

खता क्या थी अपनी ऐसी अभीतक न समझा हू मैं
जो था राज मेरे दिल का खुला आँसुओं में ढल के।3।
कहूँ लाल कह के उसने न गले  लगाया क्यों मैं
न लिपट सका था मैं ही कभी उससे यँू मचल के।4।

बड़ा ख्वाब  था खिलाऊँ उसे मोल की भी रोटी
न खरीद पाया नितनित चढ़ा भाव जो उछल के।5।
इतिहास  का असर भी हुआ करता है सुना था
नहीं साथ मेरे फिर क्यों भला काम मेरे कल के।6।

कभी गम के दौर में भी हुई आखें नम नहीं पर
रही साथ खुशियाँ तो अब तेरे अश्क यारा छलके।7।
तेरे अश्क कर रहे  हैं तेरे दिल का आशकारा
मेरे रतजगों पे तू फिर मढ़े दोष क्यों उबल के।8।

मौलिक व अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी मुसाफिर

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Comment by narendrasinh chauhan on July 27, 2017 at 5:29pm

खूब सुन्दर रचनाओं   के लिए  हार्दिक बधाई सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 27, 2017 at 5:09pm

आदरणीय लक्षमण जी अच्छी ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई सादर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 27, 2017 at 6:47am
हार्दिक धन्यवाद आदरणीय बृजेश भाई जी सादर...
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 26, 2017 at 10:39pm
बहुत ही अच्छी ग़ज़ल लगी आदरणीय..सादर
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 26, 2017 at 9:38pm
आ.भाई समर जी अभिवादन । गजल की प्रशंसा,स्नेह और मार्गदर्शन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 26, 2017 at 9:34pm
आ. भाई रवि जी गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार । आपकी दुविधा और मेरी विकट भूल का समाधान आ.भाई समर जी ने कर दिया है । सादर...
Comment by Samar kabeer on July 26, 2017 at 3:05pm
जनाब लक्ष्मण धामी'मुसाफ़िर'जी आदाब,ग़ज़ल उम्दा हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
आपने ग़ज़ल के अरकान ग़लत लिख दिये हैं,आपकी ग़ज़ल के अरकान हैं,"फ़इलात फ़ाइलातुन फ़इलात फ़ाइलातुन यानी 1121 2122 1121 2122"
'तेरे अश्क कर रहे हैं तेरे दिल का आशकार'
इस मिसरे को यूँ कर लें :-
'तेरे अश्क कर रहे हैं तेरे ग़म को आश्कारा'
Comment by Ravi Shukla on July 26, 2017 at 1:35pm

आदरणीय लक्ष्‍मण जी आपकी गजल पढ़ी भाव तो समझ आ रहे है पर आपने जो अरकान लिखे है उसके अनुसार मिसरे नहीं समझ पा रहे हैं ।

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