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क्यों लिखूं कोई और कहानी (कविता)

क्यों लिखूं मैं कोई कहानी
जो देती जन्म एक और को

देखती हूँ जब अनगिनीत हैं
आस पास फिर एक और क्यों

पनप रहे है साँप बहुत
विषैले हैं आस पास कई

देखती हूँ अजगर कहीं
जो निगल रहे है रिश्तों को

कहीं दिख रही है मीरा
जो पी रही ज़हर हैं

है कहीं पितामाह भीष्म
बाण शैया पर लेटे हुए

रो रहे हैं खुश्क आँखों से
लोग कई ऐसे सड़कों पर

हो रहा दहन हर रिश्ते का
मोल लग रहा हैं बाज़ारों में

मर्यादायें हैं बीक रहीं
सरे आम अब सड़कों पर

देख रहा सभ्य समाज तमाशा
द्रौपदी चीर हरण का

अनजान बन हैं घूम रहे
सत्य मेव जयते कहने वाले

भ्रष्टाचार के पेड़ लगे हैं
फ़ल रहें हैं अपनी जड़े जमाये

सड़ रहे अनाज कहीं तो
पक रहे कहीं पकवान हैं

असंभव को सम्भव करने वाले
क्या बन्द हुए है किताबों में

एक कहानी क्यों लिखूँ
जब पढ़ने वाले लगे व्यापार में

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by narendrasinh chauhan on August 14, 2017 at 1:18pm

वह बहोत सुन्दर रचना 

Comment by sunanda jha on August 13, 2017 at 2:30pm
वाहहहहह आदरणीया कल्पना जी बहुत सुंदर समसामयिक समस्याओं को उजागर करती बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 11, 2017 at 2:42pm

धन्यवाद आदरणीय बृजेश कुमार जी |

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 11, 2017 at 2:41pm

धन्यवाद् आदरणीया अलका जी |

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 10, 2017 at 8:04pm
भावों की अच्छी अभिव्यक्ति है आदरणीया..
Comment by अलका 'कृष्णांशी' on August 10, 2017 at 6:18pm

आदरणीया कल्पना जी , भाव  पूर्ण कविता के लिये आपको बधाइयाँ 

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