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ग़ज़ल

सर पे कैसी मुसीबत बड़ी आ गई।
देखिये फैसले की घड़ी आ गई।

साँस लेना मुनासिब भी लगता नही
ये हवा किस कदर नकचढ़ी आ गई।

दिल के साँपो को हम मार पाते नहीं,
साँप आया जो घर इक छड़ी आ गई।

ईंट पत्थर लगाकर मकां जब बना
लो हिफाजत को उसके कड़ी आ गई।

अब चमन में कहीं फूल खिलते नहीं,
पतझरों की अजब सी लड़ी आ गई।

रौशनी के लिए 'मन' मचलने लगा,
उसको बहलाने को फुलझड़ी आ गई।

मंजूषा मन

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Ravi Shukla on August 16, 2017 at 11:14am

आदरणीया मंजूषा जी आपकी गजल से पहली बार मुखातिब है अच्‍छी गजल कही आपने  मुबारक बाद कुबूल करें आदरणीय समर साहब ने काफिये पर कह ही दिया है । बाकी शुभ शुभ  । सादर

Comment by Mohammed Arif on August 15, 2017 at 7:58pm
आदरणीया मंजूषा जी आदाब,बेहतरीन ग़ज़लत्र। शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए । आल जनाब मोहतरम समर कबीर साहब के सुझावों का संज्ञान लें ।
Comment by surender insan on August 15, 2017 at 6:30pm
आदरणीया मंजूषा'मन'जी आदाब,ग़ज़ल का बहुत अच्छा प्रयास हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद कबूल करे जी।
दूसरे शैर में क़ाफ़िया दोष है मोहतरम समर कबीर साहब की सलाह पर गौर कीजियेगा।
सादर जी।
Comment by Samar kabeer on August 14, 2017 at 10:15pm
एक बात और,इस मंच पर ग़ज़ल के साथ अरकान लिखने का नियम है,आगे से ख़याल रखियेगा ।
Comment by Samar kabeer on August 14, 2017 at 10:12pm
मोहतरमा मंजूषा'मन'साहिबा आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
दूसरे शैर में क़ाफ़िया दोष है,'बड़ी''घड़ी'के साथ "नकचढ़ी"क़ाफ़िया ग़लत है ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 14, 2017 at 9:44pm
आदरणीया मंजसा जी पहली बार ठावकी ग़ज़ल पढ़ने का सौभाग्य मिला इस रचना पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें साद

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