For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल

सर पे कैसी मुसीबत बड़ी आ गई।
देखिये फैसले की घड़ी आ गई।

साँस लेना मुनासिब भी लगता नही
ये हवा किस कदर नकचढ़ी आ गई।

दिल के साँपो को हम मार पाते नहीं,
साँप आया जो घर इक छड़ी आ गई।

ईंट पत्थर लगाकर मकां जब बना
लो हिफाजत को उसके कड़ी आ गई।

अब चमन में कहीं फूल खिलते नहीं,
पतझरों की अजब सी लड़ी आ गई।

रौशनी के लिए 'मन' मचलने लगा,
उसको बहलाने को फुलझड़ी आ गई।

मंजूषा मन

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 837

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Ravi Shukla on August 16, 2017 at 11:14am

आदरणीया मंजूषा जी आपकी गजल से पहली बार मुखातिब है अच्‍छी गजल कही आपने  मुबारक बाद कुबूल करें आदरणीय समर साहब ने काफिये पर कह ही दिया है । बाकी शुभ शुभ  । सादर

Comment by Mohammed Arif on August 15, 2017 at 7:58pm
आदरणीया मंजूषा जी आदाब,बेहतरीन ग़ज़लत्र। शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए । आल जनाब मोहतरम समर कबीर साहब के सुझावों का संज्ञान लें ।
Comment by surender insan on August 15, 2017 at 6:30pm
आदरणीया मंजूषा'मन'जी आदाब,ग़ज़ल का बहुत अच्छा प्रयास हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद कबूल करे जी।
दूसरे शैर में क़ाफ़िया दोष है मोहतरम समर कबीर साहब की सलाह पर गौर कीजियेगा।
सादर जी।
Comment by Samar kabeer on August 14, 2017 at 10:15pm
एक बात और,इस मंच पर ग़ज़ल के साथ अरकान लिखने का नियम है,आगे से ख़याल रखियेगा ।
Comment by Samar kabeer on August 14, 2017 at 10:12pm
मोहतरमा मंजूषा'मन'साहिबा आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
दूसरे शैर में क़ाफ़िया दोष है,'बड़ी''घड़ी'के साथ "नकचढ़ी"क़ाफ़िया ग़लत है ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 14, 2017 at 9:44pm
आदरणीया मंजसा जी पहली बार ठावकी ग़ज़ल पढ़ने का सौभाग्य मिला इस रचना पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें साद

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"दिल दुखाना नहीं कि तुझ से कहेंहै फसाना नहीं कि तुझ से कहें गांव से दूर घर बनाया हैहै बुलाना नहीं…"
5 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-184
"धन्यवाद आदरणीय "
9 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"प्रणाम भाई अखिलेश जी, क्या ही सुंदर चौपाईयां हुईं हैं। वाह, वाह। फागुन का पूरा वृतांत कह दिया…"
9 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"बौर से फल तक *************** फागुन आया ऐसा छाया, बाग़ आम का है बौराया भरी मंजरी ने तरुणाई, महक रही…"
13 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
" दिल रुलाना नहीं कि तुझ से कहें  हम ज़माना नहीं कि  तुझ से…"
14 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
" दिल रुलाना नहीं कि तुझसे कहें  हम ज़माना नहीं कि तुझसे कहें   फ़क़त अहसास है…"
14 hours ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-184
"भाई अजय गुप्ता जी, मेरी नजर में बहुत शनदार रचना हुई है। इसके लिए बहुत बहुत बधाई। अनुष्टुप छंद तो…"
14 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-184
"यह रचना #अनुष्टुप_छंद में रचने का प्रयास किया है। हिन्दी में इस छंद का प्रयोग कम है लेकिन मेरा…"
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-184
"झूठों ने झूठ को ऊँचे, रथ पर बिठा दिया और फिर उसे खूब, सुंदर सा सजा दिया   पहिये भी गवाहों के,…"
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"कृपया गिरह में // वो ज़माना // को //अब ज़माना// पढ़ा जाए। धन्यवाद "
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"शुक्रिया मनजीत जी, बहुत आभार। ।  //तरही मिसरे पर आपका शेअर कमाल है।// हा हा हा, तिलकराज…"
yesterday
Manjeet kaur replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
" आदरणीय अजय गुप्ता जी ग़ज़ल की मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए। तरही मिसरे पर आपका शेअर कमाल है।"
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service