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असली मुजरिम (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"ख़ुदा भी आसमां से जब जमीं पर देखता होगा....!" राजेन्द्र कृष्ण जी का लिखा फ़िल्म 'धरती' का यह गीत और मजरूह सुल्तानपुरी साहब का लिखा फ़िल्म 'लाल दुपट्टा मलमल का' का गीत -"तुमने रख तो ली तस्वीर हमारी" सुनने के साथ ही देशवासी अपनी धरती पर लोकतंत्र के लिए ख़तरे बन रहे कुछ बाबाओं, मुल्ला-मौलवियों और नेताओं की कारगुजारियों पर आंसू बहाने लगा। वह असहाय था। उसका गीतकार सा अन्तर्मन इन फ़िल्मी गीतों पर लिखी पैरौडी पढ़ कर सुनाते हुए उसे चिढ़ा रहा था, रुला रहा था। कह रहा था :

" तुम ने देख तो ली तस्वीर हमारी.... पर देख लो कि किस तरह इंसान बहकता है... रंग बदलते हुए.....!"

अपने देश के ताज़े हालात और बदलती तस्वीर देख देशवासी का अंतर्मन उसे झकझोरते हुए दूसरे फ़िल्मी गीत की पैरोडी सुनाने लगा :

"ख़ुदा भी आसमां से जब इस ज़मीं पर देखता होगा...
मेरी महबूब को किसने, क्यूं बिगाड़ा, सोचता होगा ......!"



"मुसव्विर ख़ुद परेशां है के ये तस्वीर किसकी है......
बनोगी इस सदी में तुम ऐसी, ऐसी बुरी तक़दीर किसकी है......
कभी वो रो रहा होगा, कभी पछता रहा होगा......
ख़ुदा भी आसमां से जब भारत को देखता होगा.....!"


देशवासी के पास आत्मावलोकन के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था, सो चुपचाप आंसू आंखों से लुड़काता हुआ आगे की अंतरों की पैरोडी सुनता रहा :


"ज़माने भर की कुसंस्कृतियों को अपनों में समेटा है.....
कली सी धरती को कितने इंसानों ने लूटा है.....
नहीं तुम सा द्रोही कोई पहले न कोई दूसरा होगा....
ख़ुदा भी आसमां से जब भारत को देखता होगा......!"

फ़रिश्ते अब कहां राहों में आकर देखते होंगे.....
जहाँ बहकाये तुम ने पाँव, जगह वो शैतान चूमते होंगे....
किसी के दिल पे क्या गुज़री, ये वो ही जानता होगा...!
खुदा भी आसमां से जब भारत को देखता होगा.....
मेरे मेहबूब को किसने बिगाड़ा सोचता होगा..........!"

देशवासी अब स्वयं को दोषी समझ रहा था और आंसुओ को पोंछता हुआ मन ही मन कुछ दृढ़-संकल्प ले रहा था।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 31, 2017 at 4:37pm
जी, बहुत-बहुत शुक्रिया जानकारी के लिए जनाब समर कबीर साहब।
Comment by Samar kabeer on August 29, 2017 at 10:37am
पात्र चूँकि आम देश वासी है, इसलिये इसे पैरोडी न कहते हुए 'तुकबंदी' कह सकते हैं,देखियेगा ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 29, 2017 at 12:31am
रचना का अवलोकन करने व मशविरे के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब समर कबीर साहब और आदरणीय कल्पना भट्ट जी। दरअसल पात्र आम देशवासी ही है, कोई पैरोडी रचने वाला नहीं है। इस तरह की पंक्तियों के लिए यदि पैरोडी के बजाय कोई उचित दूसरा प्रचलित शब्द हो, तो अवश्य बताइयेगा। पहले वाले गाने को टीवी पर देखते समय ऐसी रचना लिखने का विचार अचानक ही सूझा था। सादर।
Comment by Samar kabeer on August 28, 2017 at 10:23pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,गीतों की पैरोडी लिखना भी एक फ़न है, इस दृष्टि से जो पैरोडी की गई है,वो बहुत कमज़ोर है, ये नये अंदाज़ की लघुकथा का प्रयास देखें क्या रंग लाता है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 28, 2017 at 6:29pm

गीतों के साथ कथा !! प्रयोग किया है आपने आगे गुरु जन बताएँगे |

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