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नई सदी के मानव - (कविता) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

इक्कीसवीं सदी के मानव तुम कहां जा रहे हो?
दानव बहुरूपिये ही यूं बने जा रहे हो!
पठन-पाठन, अध्ययन ऐसा क्यों किये जा रहे हो?
बस कठपुतली ही यूं बने जा रहे हो!
साजो-सामान, भोग-विलास में क्यों डूबे जा रहे हो?
चोलों में, बोलों से भोलों को ठगते जा रहे हो!
पतन की गर्त में गोते लगा कर क्यों खोते जा रहे हो?
स्वर्ण से, रजत, ताम्र, कांस्य, कलयुग से नीचे कहीं जा रहे हो!

(मौलिक व अप्रकाशित)
(२७-०८-२०१७)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 5, 2017 at 6:21pm
रचना पर समय देकर हौसला अफजाई और मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए सादर हार्दिक बधाई आदरणीय रामबली गुप्ता जी व आदरणीय लक्ष्मण धामी साहब।
Comment by रामबली गुप्ता on September 1, 2017 at 7:07am
आदरणीय शाहजाद उस्मानी साहब अव्वल कविता पर प्रयास के लिए सादर बधाई स्वीकारें। सिर्फ भाव की बात करें तो कविता बहुत ही सुंदर हुई है। किंतु यदि शिल्प की बात करें तो यह रचना मुझे कविता के सापेक्ष गद्य अधिक लगी। कविता में सिर्फ तुकान्तता का निर्वहन ख्र लेने मात्र से काम नही चलता। गेयता और प्रवाह भी महत्वपूर्ण होते हैं। अतः इस ओर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। सादर
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 1, 2017 at 6:31am
हार्दिक बधाई ..
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 29, 2017 at 12:23am
रचना पर अपनी राय से अवगत कराने और प्रोत्साहित करने के लिए सादर हार्दिक आभार आदरणीय समर कबीर साहब। अभी इतना समय नहीं दे पा रहा हूं, इसलिए छंद विधान ग़ज़ल सीखने का अभ्यास नहीं कर पा रहा हूं। सीखना अवश्य है।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 29, 2017 at 12:21am
अचानक लिखी गई इन चंद पंक्तियों को पसंद करने, मुझे प्रोत्साहित करने के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहब, जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' साहब, जनाब indravidyavachaspatitiwari जी, जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज', आदरणीय कल्पना भट्ट जी।
Comment by Samar kabeer on August 28, 2017 at 10:04pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,कविता का प्रयास अच्छा हुआ है,लेकिन ये छन्द में होती तो बहतर लगती,बहरहाल इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 28, 2017 at 6:09pm

चिंतन अच्छा हुआ है आदरणीय शहजाद भाई | हार्दिक बधाई |

Comment by indravidyavachaspatitiwari on August 28, 2017 at 6:02pm

कल्पना अच्छी है मानव दुर्दशा की । अब भी चेत जाय तो क्या कहना। अच्छी रचना के बधाई शेख रहमान उस्मानी साहब।

Comment by नाथ सोनांचली on August 28, 2017 at 1:49pm
आद0 शहजाद उस्मानी साहब, गहरी चिंतन को दर्शाती उम्दा सृजन, बधाई
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 28, 2017 at 11:45am
चिंतन तो अच्छा है आदरणीय..लेकिन..

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