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गजल(आज तो हर शख्स इतना पूछता)

2122 2122 212
आज तो हर शख्स इतना पूछता
हो गया क्या कत्ल? दिखता उस्तुरा।1

चंद घड़ियों में खबर देती रुला
मौत का मंजर यही हासिल हुआ।2

'वह' खड़ा है जुर्म के इकरार में
लग रहा अब यह जरा-सा अटपटा।3

जानते हैं लोग लगता मर्म भी
भेद कितना चुप्पियों में है छिपा!4

न्याय का डंडा खुदाया मौन क्यूँ?
देखना है,सच कहाँ तक साधता।5

चोर बन बैठे सिपाही आजकल
हो गया कितना कठिन यह भाँपना?6

रोशनी का दान भी व्यापार है
कीजिये भी हाथ बाँधे कल्पना।7
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on September 19, 2017 at 9:32am
आदरणीय मनन कुमार जी आदाब, अच्छे अश'आर । गुणीजनों की बातों का समर्थन करते बधाई स्वीकार करें ।
Comment by नाथ सोनांचली on September 18, 2017 at 5:33pm
आद0 मनन जी अच्छी ग़ज़ल के लिए दिली मुबारकबाद कबूल फरमायें। सादर
Comment by Manan Kumar singh on September 17, 2017 at 8:33pm
आदरणीय नीरज जी,शुक्रिया।
Comment by Manan Kumar singh on September 17, 2017 at 8:32pm
आदरणीय गिरिराज भाई,आपका आभारी हूँ।
Comment by Manan Kumar singh on September 17, 2017 at 8:31pm
आदरणीया कल्पना जी,शुक्रिया।
Comment by Manan Kumar singh on September 17, 2017 at 8:31pm
आदरणीय समर जी,शुक्रिया।लाठी तो डंडा हो गयी लेकिन 'की' रह गयी थी,परिमार्जन करूँगा।
Comment by Manan Kumar singh on September 17, 2017 at 8:29pm
आदरणीय सलीम जी शुक्रिया
Comment by Niraj Kumar on September 17, 2017 at 6:58pm

आदरणीय मनन जी,
अच्छी ग़ज़ल हुई है. दाद के साथ मुबारकबाद.
सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 17, 2017 at 6:14pm

आदरणीय मनन भाई , अच्छी गज़ल कही है ,  बधाइयाँ स्वीकार करें ।

आ. न्याय का डंडा कर लीजियेगा ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 17, 2017 at 6:04pm

आदरणीय मनन कुमार जी बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है आपने जिसके लिए हार्दिक बधाई |

कृपया ध्यान दे...

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