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2122 2122 212
कह रहे,घर को सजाया जा रहा
लग रहा सच को दबाया जा रहा।1

खून का धब्बा पड़ा गहरा बहुत
अब पसीने से मिटाया जा रहा।2

हो गयी पहली रपट रद्दी वहाँ
जाँच दल फिर से लगाया जा रहा।3

आदमी अब आदमी से तंग है
'नाम' ले-लेकर डराया जा रहा।4

मुजरिमों की हो गयी बल्ले यहाँ
बेगुनाहों को फँसाया जा रहा।5

मर्सिया माकूल होता ,क्या कहूँ?
गीत परिणय का सुनाया जा रहा।6

घिर गयी काली घटा, कहते सभी-
अब सबेरा को बुलाया जा रहा।7
@मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Manan Kumar singh on September 26, 2017 at 10:33pm
आदरणीय गिरिराज भाई,आपका बहुत बहुत शुक्रिया।
Comment by Manan Kumar singh on September 26, 2017 at 10:31pm
आभारी हूँ भाई रामबली जी।
Comment by रामबली गुप्ता on September 26, 2017 at 9:41pm
भाई मनन सिंह जी ग़ज़ल पर अच्छा प्रयास हुआ है दिल से बधाई स्वीकारिये।
Comment by Manan Kumar singh on September 26, 2017 at 9:27pm
आभारी हूँ आदरणीय समर जी,नमन।उर्दू वाले शब्दों में कहीं कहीं बात फँसती है,परिमार्जन करता हूँ,शुक्रिया।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 26, 2017 at 9:16pm

आदरनीय मनन भाई , अच्छी गज़ल कही है दिल से बधाइयाँ प्रेषित हैं , स्वीकार कीजिये ।

Comment by Manan Kumar singh on September 26, 2017 at 9:10pm
आभारी हूँ आदरणीय महेंद्र जी।'सबेरा को बुलाया जा रहा', हो सकता है,'सबेरे' को नहीं।
Comment by Samar kabeer on September 26, 2017 at 3:00pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।
6ठे शैर के ऊला में 'मर्सिया'शब्द पुल्लिंग है, देखियेगा ।
Comment by Mahendra Kumar on September 25, 2017 at 8:14pm

आ. मनन जी, बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए.

क्या ये मिसरे ऐसे हो सकते हैं :

सच ये है, सच को दबाया जा रहा।1

अब सवेरे को बुलाया जा रहा।7

देख लीजिएगा. सादर.

Comment by Manan Kumar singh on September 25, 2017 at 1:40pm
आभारी हूँ आदरणीय आरिफ भाई।
Comment by Mohammed Arif on September 25, 2017 at 1:21pm
आदरणीय मनन कुमार जी आदाब, बेहतरीन ग़ज़ल । हर शे'र बेहतरीन और वज़्नदार ।हार्दिक बधाई स्वीकार करें । बाक़ी गुणीजन आपनी अमूल्य राय देंगे ।

कृपया ध्यान दे...

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