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2122 2122 2122 2
रेत- कण से इक घरौंदा मैं बनाता हूँ
अनछुए सब ख्वाब फिर उसमें सजाता हूँ।1

कोशिशें कितनी हुई हैं चाँद पाने की
हर दफा बिखरा पसीने में नहाता हूँ।2

हर लहर आभार कहकर लौट जाती है
प्यास का मारा हुआ मैं तिलमिलाता हूँ।3

बादलों की बदगुमानी का रहा कायल
बूँद पड़ जाये जरा नजरें गड़ाता हूँ।4

कह गयी बदली हवा अब रुत बदलनी है
मैं लुटा गठरी,हमेशा ही लजाता हूँ।5

सच कहा जाता नहीं, सब लोग कहते हैं,
आँच अंतर की जलाता हूँ,बुझाता हूँ।6

रास्ते मुश्किल,भले जितना अँधेरा हो,
रोशनी के वास्ते बढ़ता ही' जाता हूँ।7
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on October 6, 2017 at 7:20pm
जनाब राज नवादवी जी,आपका शुक्रिया।
Comment by राज़ नवादवी on October 6, 2017 at 4:31pm

जनाब मनन कुमार जी,अच्छी ग़ज़ल की प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Manan Kumar singh on October 4, 2017 at 7:39am
आभारी हूँ आदरणीय उस्मानी जी।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 4, 2017 at 1:10am
बढ़िया अशआर के साथ बेहतरीन सृजन के लिए सादर हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह जी।
Comment by Manan Kumar singh on October 3, 2017 at 6:19pm
जनाब सलीम जी,आभारी हूँ।
Comment by Manan Kumar singh on October 3, 2017 at 6:17pm
आभारी हूँ आदरणीय समर साहिब,आदाब।
Comment by SALIM RAZA REWA on October 3, 2017 at 5:20pm
जनाब मनन कुमार जी,
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई
Comment by Samar kabeer on October 3, 2017 at 2:33pm
जनाब मनन कुमार जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Manan Kumar singh on October 3, 2017 at 1:48pm
स्नेह बर्षा के लिए आभारी हूँ आदरणीय आरिफ भाई,आदाब।
Comment by Mohammed Arif on October 3, 2017 at 11:44am
आदरणीय मनन कुमार जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल, मारक शे'र । हर शे'र कुछ कहता है । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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