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बहर - 2112
काफ़िया - आम; रदीफ़ - चले

जाम चले
काम चले।

मौत लिये
आम चले।

खुद का कफ़न
थाम चले।

सांसें आठों
याम चले।

सुब्ह हो या
शाम चले।

लोग अवध
धाम चले।

मन में बसा
राम चले।

पैसा हो तो
नाम चले।

जग में 'नमन'
दाम चले


मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 27, 2017 at 12:09pm
आ0 रामबली जी आपका बहुत आभार।
Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 27, 2017 at 12:08pm
आ0 गिरिराज जी आपके प्रोत्साहन का हृदय से आभार।
Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 27, 2017 at 12:07pm
समर साहिब आभार।
Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 27, 2017 at 12:05pm
आ0 महेंद्र कुमार जी हौसला आफजाई का आपका बहुत आभार।
Comment by रामबली गुप्ता on September 26, 2017 at 9:55pm
सुंदर प्रयास के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीय वासुदेव भाई जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 26, 2017 at 9:18pm

वाह वा, क्या बात है , एक रुक्नी गज़ल बहुत कामयाबी से कही है आपने । हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Samar kabeer on September 26, 2017 at 3:10pm
जनाब बासुदेव अग्रवाल'नमन'जी आदाब,इस ग़ज़ल में कथ्य कुछ नहीं सिर्फ़ क़ाफ़िया और रदीफ़ है, बहरहाल इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Mahendra Kumar on September 25, 2017 at 8:38pm

छोटी बह्र पर अच्छी ग़ज़ल कही है आपने आ. बासुदेव जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

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