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पेइंग-गेस्ट और ब्लैकमेलर (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"चाय बनाने को लेकर कलह करते हैं।"
"अच्छा! तो तू चाय मत बनाया कर! उसे ही बनाने दिया कर!"
"झाड़ू-पौंछा और घर संवारने की कह-कहकर कलह करते हैं।"
"अच्छा! तू सब कुछ वैसा ही पड़े रहने दिया कर, तू कोई नौकरानी थोड़ी न है, अपनी सरकारी नौकरी के अलावा तू कुछ मत किया कर। अपने आप को संवारो और बच्चों को संभालो!"
"कहते हैं कि बीवी हो, यह सब भी करना ही होगा!"
"अरे! ऐसे शौहर के होते बीवी तो नहीं, बेवा बनना बेहतर है!"
"विधवा जैसी ही तो जी रही हूं, अम्मी!" अपने-अपने काम, अपने-अपने ख़र्चे, बस!"
"और बच्चे! उनका क्या ...?"
"वे समझदार हो गये हैं, हमारे बीच ब्लैकमेलर हो गये हैं!"
"अच्छा! तो फिर काट लें ज़िन्दगी उसी शौहर के साथ, कट ही जायेगी, लाखों जोड़ों की तरह! ख़ुद को पेइंग-गेस्ट समझ ले या शौहर को!"

फिर मायके का फोन कट गया।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 19, 2017 at 4:22pm
रचना पर समय देकर अनुमोदन व समीक्षात्मक टिप्पणी और हौसला अफज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीया नीता कसार जी और आदरणीय सुरेन्द्र इंसान जी।
Comment by surender insan on October 8, 2017 at 8:47am
उफ उफ उफ!!! बहुत बेहतरीन रचना की आपने बस इतना ही कहूँगा जी। बहुत बहुत बधाई हो जी।
Comment by Nita Kasar on October 6, 2017 at 6:49pm
बेटी को पीहर से जैसे संस्कार मिलते है वे उसी आधार पर उसकी दुनिया बनाने में बड़ी भूमिका निभाते है।महिला परिवार की धुरी होती है।ऊपर से पत्नि का ये कहना एेसे शौहर के होते बीवी नही वेबा होना बेहतर उसकी पीड़ा दर्शाता है ।कितने विपरीत हालात है उस पत्नि के सामने कि बच्चे ब्लैकमेलर बन गये ।खूब ख़ाका खींचा है पीड़ित पत्नि के मन का बधाई आद० शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 4, 2017 at 10:16pm
बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब डॉ. विजय शंकर जी। आपकी समीक्षात्मक और ज्ञानवर्धक टिप्पणियों हमेशा हमें मार्गदर्शित करती हैं। मेरी इस लघुकथा की सार्थकता और स्तर का अनुमोदन करते हुए मुझे मार्गदर्शित एवं प्रोत्साहित करने के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया। पूरी कोशिश करूंगा कि आगे भी आप सुधी पाठकों की अपेक्षा अनुरूप सार्थक लेखन कर सकूं। एक बार पुनः हार्दिक आभार।
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 4, 2017 at 6:33pm
आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी , बात वाकई में दिन प्रति दिन सामने आने वाली सच्चाई है पर आपने जिस पक्ष को लेकर इसे कथा का रूप दिया वह सराहनीय है , उसी से आपकी यह कथा अत्यंत उच्च स्तर की प्रस्तुति हो गई। इसकी विषयवस्तु पर आते हैं - आधुनिक कहे जाने वाले परिवेश की दें जो एक अनिवार्यता बंटी जा रही है। समझ का फेर है। पैसा कमाना ही जीवन का सार हो होता जा रहा है या योन कहें कि एक छोटा सा भी न्यूक्लियर परिवार चलाने के लिए दोनों का नौकरी करना बुनयादी अनिवार्यता बनती जा रही है। यह समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र दोनों विषयों को चुनौती देता विषय है। वैसे तमाम देशों में यह ऐसी प्रबल अनिवार्यता नहीं है कि इसके बिना एक संपन्न जीवन जिया ही न जा सके। यह भी विचारणीय है कि परिवार के लिए जो त्याग किया जाता है वह परिवार से कितना कुछ छीन लेता है। यहीं पर सोचना पड़ता है कि सम्पन्नता जरूरी होते हुए भी सुख का पर्याय नहीं है। अतः दोनों में से एक को चुनने के पूर्व खूब सोच विचार करना चाहिए।
सम्प्रति तो आपको इस वैचारिक कथा के लिए अनेकानेक बधाईयां। सादर।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 4, 2017 at 3:50pm
ऐसा तो सोचा न था। इतनी हौसला अफज़ाई और अनुमोदन लायक इस बार लिख सका, तो आप सभी की टिप्पणियों से प्राप्त सतत् मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से ही। रचना पर त्वरित टिप्पणियों के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब तेज वीर सिंह साहब, जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहब, जनाब समर कबीर साहब और मुहतर्मा प्रतिभा पाण्डेय साहिबा। इसी तरह आशीर्वाद और दुआओं के साथ रचनाओं पर समय देकर टिप्पणी कर मार्गदर्शन प्रदान करते रहिएगा। यही तो इस अद्वितीय साहित्यिक मंच की विशेषता/कार्यशाला है।
Comment by pratibha pande on October 4, 2017 at 3:41pm
वाह वाह और बस वाह, एकदम कसी हुई शानदार कथा। हार्दिक बधाई आदरणीय उस्मानी जी।
Comment by Samar kabeer on October 4, 2017 at 3:27pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,बहुत उम्दा और मुख़्तसर लघुकथा लिखी,मुझे बहुत पसंद आई,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Mohammed Arif on October 4, 2017 at 2:11pm
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब, सशक्त लघुकथा, बेहतरीन कथानक । संवाद भी पात्रानुकूल है । इस शानदार प्रस्तुति पर ढेरों बधाइयाँ स्वीकार करें ।
Comment by TEJ VEER SINGH on October 4, 2017 at 9:22am

हार्दिक बधाई आदरणीय शेख उस्मानी जी।बहुत गहरी और गंभीर बात कहती हुई लाज़वाब लघुकथा।

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