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ग़ज़ल - मिलते कहाँ हैं लोग भी होशो हवास में

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ठहरी मिली है ज़िंदगी उनके गिलास में ।
मिलते कहाँ हैं लोग भी होशो हवास में ।।

देकर तमाम टैक्स नदारद है नौकरी ।
अमला लगा रखा है उन्होंने विकास में ।।

सरकार सियासत में निकम्मी कही गई ।
रहते गरीब लोग बहुत भूँख प्यास में ।।

बेकारियों के दौर गुजरा हूँ इस कदर ।
घोड़ा ही ढूढता रहा ताउम्र घास में ।।

यूँ ही तमाम कर लगे हैं जिंदगी पे आज ।
रहना हुआ मुहाल है अपने निवास में ।।

कितने नकाब डाल के मिलने लगे हैं लोग ।
चेहरा नहीं पढ़ा गया अब तक उजास में ।।

दौलत की ख़ासियत को जरा देखिए हुजूर ।
उलझे हजार हुस्न यहां खास खास में ।।

खुशबू सी आ रही है हवाओं से बेहिसाब ।
शायद बहार होगी कहीं आस पास में ।।

जब से खुला है मैकदा उनकी गली के पास ।
निकले शरीफ़ लोग बहुत बे लिबास में ।।

कड़वी ज़ुबान है तो उसे भी सलाम कर ।
कीड़ें पड़े तमाम हैं अक्सर मिठास में ।।

कैसा हवस का दौर है कैसे पढ़े हैं लोग ।
होते हैं फेल इश्क़ की पहली कलास में ।।

यूँ ही मिली नज़र थी इरादा भी नेक था ।
मुज़रिम बना गया है कोई फिर कयास में ।।

--नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on October 6, 2017 at 8:40pm
आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब , बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
नोट:- कितना अच्छा हो अगर आप जैसे निष्णाण ग़ज़लगो साहित्य अन्य विधाओं पर अपनी सृजनशीलता का परिचय देने वालों को भी अपनी टिप्पणियों से पोषित करें ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on October 6, 2017 at 12:35pm
आ0 कबीर सर सादर नमन के साथ आभार
Comment by Naveen Mani Tripathi on October 6, 2017 at 12:33pm
आ0 अफरोज सहर साहब शुक्रिया मैं बे लिबास शब्द हटा देता हूँ ।
Comment by Afroz 'sahr' on October 5, 2017 at 3:09pm
आदरणीय नवीन जी आदाब आपका मिसरा है ,,निकले शरीफ़ लोग बहुत बे लिबास में,,, इस मिसरे के ,,ज़रब,, पर ,,बे लिबास में,,, यहीं पर गौ़र करने की ज़रूरत है। कयूँ की ,,बे लिबास,, लफ़्ज़ कहीं भी किसी भी संदर्भ में पयोग किया जा सकता है। परंतु ,,बे लिबास,, के साथ जब ,,में,,,को उच्चारित किया जाएगा तो एक बिल्कुल ही नये शब्द की उत्पत्ती हो रही है। ,,,लिबास में,,,, लफ्ज़ तो व्यवहारिक है किंतू ,,,बे लिबास में,,ये क्या बात हुई ,,बे लिबास,,, के स्थान पर एक उचित और राइज़ लफ़्ज़ ,,,,बरहना,,, पूर्व से ही प्रयोग में है इसलिए ,,,,बे लिबास में,,,, कहना ना तो व्यवहारिक है ना अरूज़ सम्मत ।
Comment by Samar kabeer on October 5, 2017 at 2:46pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।
सातवें शैर में क़ाफ़िया "ख़ास"उर्दू के लिहाज़ से ग़लत है ।
नवें शैर पर अफ़रोज़ साहिब से सहमत हूँ ।
Comment by Samar kabeer on October 5, 2017 at 2:33pm
'ज़ईफ़' यानी कमज़ोर ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on October 5, 2017 at 10:17am
भाई सुरेंद्र नाथ कुश क्षत्रप जी आभार
Comment by Naveen Mani Tripathi on October 5, 2017 at 10:15am
आ0 अफरोज सहर साहब यह जईफ क्या है थोड़ा समझाइये
Comment by नाथ सोनांचली on October 5, 2017 at 5:06am
जब से खुला है मैकदा उनकी गली के पास ।
निकले शरीफ़ लोग बहुत बे लिबास में ।।

आद0 नवीन जी सादर अभिवादन, बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही आपने। शैर दर शेर मुबारकबाद कबूल करें।
Comment by Naveen Mani Tripathi on October 5, 2017 at 12:45am
आ0 राज नवादवी साहब शुक्रिया ,। बेकरियों के दौर से गुजरा हूँ इस कदर । यहां टाइपिंग मिस्टेक म् "से"छूट गया है ।

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