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दिल का ये मसअला है कोई दिल लगी नहीं - सलीम रज़ा रीवा : ग़ज़ल

221 2121 1221 212

..

दिल का ये मसअला है कोई दिल लगी नहीं,

मुमकिन तेरे बग़ैर मेरी ज़िन्दगी नही

..

ये और बात है कि वो मिलते  नहीं मगर,

किसने कहा कि उनसे मेरी दोस्ती नहीं

..

तेरे ही दम से खुशियां है घर बार में मेरे,

होता  जो तू नहीं तो ये होती ख़ुशी नहीं

..

वो क्या गया की रौनके महफ़िल चली गयी,

जल तो रही है शम्अ मगर रोशनी नहीं

..

ख़ून-ए-जिगर से मैंने सवाँरी है हर ग़ज़ल,

मेरे, सुख़न  का  रंग कोई  काग़ज़ी नहीं

..

मैं  खुद  गुनाहगार  हूँ अपनी  निगाह  में,

उसके ख़ुलूस-ओ-प्यार में कोई कमी नहीं

..

तुझसे रज़ा के शेरों में संदल सी है महक,

मुमकिन तेरे बग़ैर मेरी शायरी नहीं

...

मौलिक व अप्रकाशित

Gazal by salimrazarewa

Views: 876

Comment

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Comment by SALIM RAZA REWA on October 16, 2017 at 6:59pm
जनाब आरिफ साहब,
आपकी नज़रे इनायत के लिए शुक्रिया, आपकी महब्बत सलामत रहे.
Comment by Afroz 'sahr' on October 16, 2017 at 3:25pm
जनाब सलीम साहिब आदाब दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ कुबूल फ़रमाएं सादर,,,
Comment by vandana on October 16, 2017 at 1:46pm

..
ख़ूनें जिगर से मैंने सवाँरी है हर ग़ज़ल,
मेरे सुख़न का  रंग कोई  काग़ज़ी नहीं
..
मैं  खुद गुनाहगार हूँ अपनी निगाह  में,
उसके ख़ुलूस-ओ-प्यार में कोई कमी नहीं

वाह बहुत खूब आदरणीय 

Comment by Mohammed Arif on October 16, 2017 at 10:45am
तेरे ही दम से खुशियां है घर बार में मेरे,
होता जो तू नहीं तो ये होती ख़ुशी नहीं । सच कहा आपने । किसी के रहने से ही तो ख़ुशियाँ थिरकती है ।
शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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