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ग़ज़ल - यूँ ही गाल बजाते रहिये

यूँ ही गाल बजाते रहिये।
भोंपू सा चिल्लाते रहिये।

अपना उल्लू सीधा करके,
दो का चार बनाते रहिये।

जिससे काम बने बस वो ही,
पट्टी रोज पढ़ाते रहिये।

सूरज उगने ही वाला है,
ये एहसास कराते रहिये।

हम प्रतिपालक हम हैं रक्षक,
चीख चीखकर गाते रहिये।

जीती बाजी हार न जायें,
दाँव पेंच दिखलाते रहिये।

जिनको राह के रोड़े समझें
उनको रोज हटाते रहिये।

मौलिक एवं अप्रकाशित रचना

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Comment

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Comment by नाथ सोनांचली on October 23, 2017 at 1:06pm
आदरणीय अवध वविश्वकर्मा जी आदाब, बढ़िया ग़ज़ल । शै'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए । मंच की परंपरा के अनुसार अरकान लिखे होते तो समझने में और सीखने में आसानी होती।
Comment by Ram Awadh VIshwakarma on October 22, 2017 at 9:04pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय जवाहर लाल सिंह जी आपके द्वारा एक लाज़बाब शेर ग़ज़ल में वृद्धि के लिये।
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on October 22, 2017 at 8:57pm

जीती बाजी हार न जायें,
दाँव पेंच दिखलाते रहिये।

जिनको राह के रोड़े समझें
उनको रोज हटाते रहिये।

अपना सीना ठोक ठोक कर
यूं ही रौब जमाते रहिये!

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on October 22, 2017 at 8:52pm
आदरणीय मंडल साहब सादर धन्यवाद ग़ज़ल सराहना के लिये
Comment by Ram Awadh VIshwakarma on October 22, 2017 at 8:50pm
आदरणीय ब्रज साहब सादर धन्यवाद
Comment by Ram Awadh VIshwakarma on October 22, 2017 at 8:49pm
सादर धन्यवाद आदरणीया कल्पना भट्ट जी
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 22, 2017 at 8:25pm

उम्दा ग़ज़ल आदरणीय , सदर बधाई |

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 22, 2017 at 8:04pm
उम्दा ग़ज़ल हुई आदरणीय..बधाई
Comment by Kalipad Prasad Mandal on October 22, 2017 at 3:11pm

आदरणीय राम अवध विश्वकर्मा जी , सामयिक विषय पर बहुत खुबसूरत ग़ज़ल हुई है |बधाई आपको 

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on October 21, 2017 at 4:54pm
ज़नाब मुहम्मद आरिफ साहब। गज़ल की सराहना केलिये सादर आभार

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