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अब भी क़ायम है(ग़ज़ल)- बलराम धाकड़

१२२२,१२२२,१२२२,१२२२

दिलों पर कुछ ग़मों की हुक़्मरानी अब भी क़ाइम है,
कि निचली बस्तियों में सरगरानी अब क़ाइम है।

हक़ीक़त है कि उनके वास्ते सब कुछ किया हमने,
मगर औरत के लव पर बेज़ुबानी अब भी क़ाइम है।

मैं शादी तो करुँगी, मह्र, वालिद आप रख लेना,
कि अपनी बात पर बिटिया सयानी अब भी क़ाइम है।

यक़ीनन छोड़ दी हम सबने अब शर्मिन्दगी लेकिन,
हया का आँख में थोड़ा सा पानी अब भी क़ाइम है।

धड़कना दिल ने कुछ कम कर दिया, इस दौर में लेकिन,
लहू के चंद क़तरों में रवानी अब भी क़ाइम है।


मुख़ालिफ़ ज़ुल्म के कुछ लोग जो आए हैं सड़कों पर,
ये जोख़िम ये बताता है, जवानी अब भी क़ाइम है।

ये सच है, मिल गई है उसमें अब बारूद की कुछ बू,
मगर घाटी में खु़शबू जाफ़रानी अब भी क़ाइम है।

कि धरती की हरीरी छीन ली अपनी तरक्क़ी ने, 
मग़र अम्बर की रंगत आसमानी अब भी क़ाइम है।

हमारे गाँव ने ख़ुद को बहुत महफ़ूज़ रक्खा है,
रवायत हर पुरानी से पुरानी अब भी क़ाइम है।

ज़मीनें बेच दीं सब, तर्बियत सारी बचा ली है,
हमारे पास पुरखों की निशानी अब भी क़ाइम है।

मौलिक/अप्रकाशित।

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 5, 2017 at 6:36pm
आदरणीय बहुत ही खूबसूरत रवानगी लिए हुए ग़ज़ल हुई..सादर
Comment by Samar kabeer on November 5, 2017 at 5:35pm
जनाब बलराम जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।
कुछ बातें बहना राजेश कुमारी जी बता चुकी हैं,उनका संज्ञान लें,कुछ मैं बताता हूँ ।
सबसे पहली बात 'क़ायम'शब्द आम प्रचलन में बोला जाता है,लेकिन इसका सही तलफ़्फ़ुज़(उच्चारण)है "क़ाइम" ।
दूसरी बात ये कि शब्दकोष में इसके जो अर्थ दिए हैं वो ये हैं,खड़ा होने वाला,खड़ा हुआ,सीधा,मज़बूत,पाईदर और सबसे अंत में एक अर्थ है"मौजूद"जो आपकी रदीफ़ में काम कर रहा है,वैसे मेरा मत है कि इसकी रदीफ़ "बाक़ी" है ज़ियादा सटीक होती ।

'मैं शादी तो करूंगी,मेहर वालिद आप रख लेना'
ये मिसरा शरीअत की रु से मेल नहीं खाता, क्योंकि 'मह्र'पिता नहीं रख सकता,ये अधिकार लड़की का होता है,और कुछ हालात में मह्र निकाह के वक़्त ही अदा कर दिया जाता है,और ये उधार भी होता है,कि पति अपनी ज़िंदगी में कभी भी उसे अदा कर सकता है,और सही शब्द है "मह्र"जिसका वज़्न है 21 ।
Comment by Balram Dhakar on November 4, 2017 at 8:32pm
धन्यवाद आदरणीय गुरप्रीत सिंह जी। बहुत बहुत शुक्रिया हौसला अफ़जाई का।
सादर।
Comment by Gurpreet Singh on November 4, 2017 at 11:42am
वाह वाह आदरणीय बलराम जी ..बहुत उम्दा ग़ज़ल कही आपने .. सभी अशआर अपना असर छोड़ रहे हैं

ये सच है, मिल गई है उसमें अब बारूद की कुछ बू,
मगर घाटी में खु़शबू जाफ़रानी अब भी क़ायम है।
वाह बहुत खूबसूरत
Comment by Balram Dhakar on November 3, 2017 at 3:34pm
आदरणीय रवि सर। बहुत बहुत धन्यवाद, ग़ज़ल में आपकी शिरक़त और हौसला अफ़जाई के लिए।
Comment by Ravi Shukla on November 3, 2017 at 3:10pm
आदरणीय बलराम जी बहुत ही बढ़िया गजल कही एक रवानी है पूरी ग़ज़ल में। पढ़ कर बहुत अच्छा लगा शेर दर शेर दिली मुबारकबाद कुबूल करें
Comment by Balram Dhakar on November 3, 2017 at 11:46am
आदरणीया राजेश कुमारी जी, ग़ज़ल में शिरक़त और हौसला अफ़जाई का बहुत बहुत धन्यवाद।
ईता दोष हटाने का प्रयास करूंगा।
यक़ीनन छोड़ दी हम सबने... को
अमूमन छोड़ दी हम सबने... कर दिया जाए तो? कृपया मार्गदर्शन करने का कष्ट करें।
सादर
Comment by Balram Dhakar on November 3, 2017 at 11:31am
धन्यवाद आदरणीय नरेंद्र जी।
Comment by Balram Dhakar on November 3, 2017 at 11:28am
आदरणीय विजय सा०, बहुत बहुत धन्यवाद आपका।
Comment by Balram Dhakar on November 3, 2017 at 11:26am
बहुत बहुत धन्यवाद आपका आदरणीय मो० आरिफ़ जी।
सादर।

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