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नाराज़गी है कैसी भला ज़िन्दगी के  साथ - सलीम रज़ा रीवा

221 2121 1221 212
-
नाराज़गी है कैसी भला ज़िन्दगी के  साथ.
रहते हैं ग़म हमेशा ही यारों खुशी के साथ
-

नाज़-ओ-अदा के साथ कभी बे-रुख़ी के साथ.
दिल में उतर  गया वो बड़ी सादगी के साथ

-
माना कि लोग जीते हैं हर पल खुशी के साथ.
शामिल है जिंदगी में मगर ग़म सभी के साथ

-
आएगा मुश्किलों में भी जीने का फ़न तुझे.
कूछ दिन गुज़ार ले तू मेरी जिंदगी के साथ
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ख़ून-ए- जिगर निचोड़ के रखते हैं शेर में.
यूँ ही नहीं है  प्यार हमें   शायरी के साथ 
-
अच्छी तरह से आपने जाना नहीं जिसे.
यारी कभी न कीजिये उस अजनबी के साथ
-
मुश्किल में कैसे जीते हैं यह उनसे पूछिये.
गुज़रा है जिनका वक़्त सदा मुफलिसी के साथ
-
उसपे  ना  एतबार   कभी  कीजिए  " रज़ा .
धोका किया है जिसने हर एक आदमी के साथ
....
मौलिक एवं अप्रकाशित

 

 

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Comment

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Comment by SALIM RAZA REWA on November 9, 2017 at 10:07am
जनाब मोहम्मद आरिफ साहिब,
आपकी ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफज़ाई का दिली शुक्रिया, आपकी महब्बत हमारे लिए अनमोल हैं बहुत बहुत शुक्रिया... मुझे इस समय समर साहब की महब्बत नहीं मिल रही है शायद ओ नाराज़ हैं.. बात हो तो सलाम बोलिएगा...
Comment by SALIM RAZA REWA on November 9, 2017 at 10:02am
आदरणीय आशीष श्रीवास्तव जी,
ग़ज़ल पे आपकी शिरक़त के लिए शुक्रिया, आपने जिस गलती के तरफ़ ध्यान दिलाया वो मिसरा दुरुस्त कर लिया गया है, आपकी पुनः नज़रे इनायत चाहता हूँ
सादर..
Comment by SALIM RAZA REWA on November 9, 2017 at 9:54am
जनाब अफ़रोज साहब,
ग़ज़ल पर आपकी नज़रे इनायत और हौसला अफज़ाई के लिए शुक्रिया,
Comment by Mohammed Arif on November 8, 2017 at 10:54pm
नाराज़गी है कैसी भला ज़िन्दगी के साथ
रहते हैं ग़म हमेशा ही यारों खुशी के साथ ।वाह!वाह!बहुत ख़ूब ! कोई ज़िंदगी का असली जाँबाज ही ऐसा शे'र लिख सकता है । सच है, जिसने भोगा है उसी ने तो लिखा है ।
ढेरों मुबारकबाद आदरणीय सलीम रज़ा साहब ।
Comment by Ashish shrivastava on November 8, 2017 at 9:01pm
मुहतरम सलीम रज़ा साहब , बहुत ख़ूब ग़ज़ल कही है ।
मुबारकबाद !
ग़ज़ल के चौथे शे'र में तकाबुल-ए-रदीफ़ का ऐब दिख रहा है । ग़ौर फ़रमायें ।ज
Comment by Afroz 'sahr' on November 8, 2017 at 5:15pm
जनाब सलीम रज़ा साहिब अच्छी ग़ज़ल है दादके साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ,,,

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