For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

“भाभी, उस तरफ़ मत देखो; इस तरफ़ देखो! यह देखो कितना सुन्दर बच्चा! बिल्कुल वैसा ही, जैसा बैडरूम में भैया के लगाये पोस्टर में है, है न!”

“हां, बहू अच्छे चेहरे देखती रहो, अच्छी फिल्में देखो, भगवान ने चाहा तो तू भी मुझे ज़ल्दी ही सुंदर सा पोता देगी!”

सरकारी अस्पताल के महिला वार्ड के आख़री बैड पर अपनी मां के सिरहाने बैठी सम्मो अगले पलंग के पास बैठे किसी परिवार के सदस्यों की बातें सुन कर अपनी मां को और दूध पीती अपनी नन्हीं बहन को बड़ी दया से देखने लगी। मां का उतरा हुआ पीला सा चेहरा और कुछ ही दिन की मरियल सी बहन का कुछ अजीब सा चेहरा देखकर उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े।

“सुंदर बेटे की चाह में मां ने भी शायद सुंदर चेहरे ही देखे होंगे!” यह सोचते हुए उसे याद आ गये घर वालों के चेहरे और उनके बोल।

“देख, इस बार सुंदर सलोनो बेटा ही पैदा करियो!”

“बेटी हुई, तो भगा दूंगा!”

“नौकरी करती है, हम पर कोई अहसान नहीं!”

“कित्ता खायेगी? घर के काम कौन करेगा?”

बारी-बारी से घर की कलह और सबके ताने उसके कानों में फिर से गूंज से रहे थे। हर ताने के साथ घर वालों के चेहरे के भाव भी उसे फिर से झकझोर रहे थे। नौकरी करते हुए, घर-गृहस्थी संभालते हुए उसकी देखभाल करने वाली उसकी मां अपनी खुद की देखभाल में कितनी लापरवाही कर दिया करती थी। वह भी अपनी कोई परेशानी मां को कभी नहीं बताती थी उसकी तरह अपने चेहरे पर भी नकली चेहरे से लगाये हुए।

“तुम अकेली हो यहां! आज घर का कोई बड़ा क्यों नहीं आया अभी तक?” नर्स की आवाज़ सुन कर सम्मो की तंद्रा टूटी। उसने मां को इशारे से बताया। नर्स उससे मुख़ातिब होकर बोली, “बच्ची बहुत कमज़ोर पैदा हुई है! जच्चा-बच्चा दोनों का लम्बा इलाज़ चलेगा।”

“वो तो करा ही लूंगी किसी तरह! लेकिन सिस्टर, घर वालों की सोच का कोई इलाज़ नहीं हो सकता क्या?” पथराई सी आंखें फ़ाड़ कर सम्मो की मां ने नर्स से कहा। नर्स और सम्मो की नज़रें उसकी शक्ल पर टिक गईं।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 696

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by TEJ VEER SINGH on November 11, 2017 at 8:05pm

हार्दिक बधाई आदरणीय शेख उस्मानी साहब जी।बेहतरीन संदेश परक लघुकथा।

Comment by Dr. Vijai Shanker on November 11, 2017 at 7:53pm
सोच का ही तो इलाज नहीं हो पाता है , लाइलाज तो वही है , वरना दुनिया तो एक मोबाईल ने ही बहुत बदल दी है। सोच मोबाइल प्रयोग करने वालों की भी बदली।
बड़ी बात वाली सुन्दर लघु-कथा के लिए बधाई, आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी , सादर।
Comment by SALIM RAZA REWA on November 11, 2017 at 5:50pm
जनाब उस्मानी साहब,
बहुत ही खूबसूरत लघु कथा हुई है दिल खुश हो गया, हक़ीक़त को रूबरु करती हुई..
“हां, बहू अच्छे चेहरे देखती रहो, अच्छी फिल्में देखो, भगवान ने चाहा तो तू भी मुझे ज़ल्दी ही सुंदर सा पोता देगी!” वहह वाह ढेरों मुबारक़बाद...

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted blog posts
10 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
12 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
16 hours ago
Jaihind Raipuri posted a blog post

ग़ज़ल

2122    1212    22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत मेंक्या से क्या हो गए महब्बत में मैं ख़यालों में आ गया उस…See More
21 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Admin's group आंचलिक साहित्य
"कुंडलिया छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ी ह भाखा, सरल ऐकर बिधान सहजता से बोल सके, लइका अऊ सियान लइका अऊ…"
21 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक…See More
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहै हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Monday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर…See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन व आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"बेशक। सच कहा आपने।"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service