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'आपके पास है जवाब कोई'

फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़इलुन/फेलुन


मेरे ग़म का है सद्दे बाब कोई
आपके पास है जवाब कोई

सुनके मेरी ग़ज़ल कहा उसने
अपने फ़न में है कामयाब कोई

उतनी भड़केगी आतिश-ए-उल्फ़त
जितना बरतेगा इज्तिनाब कोई

सबसे उनको छुपा के रखता हूँ
तोड़ डाले न मेरे ख़्वाब कोई

पास है जिनके दौलत-ए-ईमाँ
उन पर आता नहीं अज़ाब कोई

कोई उस पर यक़ी नहीं करता
अच्छा बन जाए जब ख़राब कोई

आमने सामने हों जब दोनों
उनको देखे कि माहताब कोई
-----
सद्दे बाब-बिल्कुल रोक देना
इज्तिनाब-पहलू बचना,परहेज़ करना ।

समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on November 20, 2017 at 10:51am
जनाब अजय तिवारी जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Samar kabeer on November 20, 2017 at 10:50am
जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Samar kabeer on November 20, 2017 at 10:47am
जनाब मोहित मिश्रा जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Samar kabeer on November 20, 2017 at 10:46am
बहना राजेश कुमारी जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Samar kabeer on November 20, 2017 at 10:44am
जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Samar kabeer on November 20, 2017 at 10:43am
जनाब अफ़रोज़ साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।
Comment by Dr. Vijai Shanker on November 17, 2017 at 5:47am
वाह !
सबसे उनको छुपा के रखता हूँ
तोड़ डाले न मेरे ख़्वाब कोई।
बहुत खूब। हर शेऱ लाजवाब है। आदरणीय समर कबीर साहब , नमस्कार , इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई , सादर।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on November 16, 2017 at 10:57am

मुहतरम जनाब समर कबीर  साहिबआदाब  , उम्दा ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ 

Comment by नाथ सोनांचली on November 15, 2017 at 1:50pm
कोई उस पर यक़ी नहीं करता
अच्छा बन जाए जब ख़राब कोई
क्या शैर कहा आपने,बाकमाल, वाह वाह वाह

पास है जिनके दौलत-ए-ईमाँ
उन पर आता नहीं अज़ाब कोई
सच बयाँ करता उम्दा शैर, वाह,जिनके पास ईमान की दौलत,उन्हें फिर क्या तकलीफ, कोई अजाब उन्हें नहीं छू सकता।

उतनी भड़केगी आतिश-ए-उल्फ़त
जितना बरतेगा इज्तिनाब कोई

बहुत बेहतरीन, बहुत उम्दा वाह।
आद0 समर कबीर साहब सादर प्रणाम, एक एक शैर को क्या कहूँ, यहाँ तो हर शैर पढ़कर वाह निकलता है,बार बार नमन आपको, इस ग़ज़ल पर। बहुत बहुत बधाई प्रस्तुति पर। बाकमाल ग़ज़ल
Comment by vijay nikore on November 14, 2017 at 7:17pm

हर शेर को पढ़ कर जब "वाह" निकले, और फिर एक और "वाह", ... उस गज़ल को क्या कहिए !
सच, बहुत ही लुत्फ़ मिला आपकी गज़ल को पढ़ कर। यह अनुभव बयाँ करना मुश्किल है, आदरणीय भाई समर जी।

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