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बंद किताब ...

ठहरो न !
थोड़ी देर तो रुक जाओ
अभी तो रात की स्याही बाकी है
सहर की दस्तक से घबराते हो
प्यार करते हो
और शरमाते हो
कभी नारी मन के
सागर में उतर के देखो
न जाने कितने गोहर
सीपों में
किसी के लम्स के मुंतज़िर हैं
देहाकर्षण के परे भी
एक आकर्षण होता है
जहां भौतिक सुख के बाद का
एक दर्पण होता है
नशवरता से परे
अनंत में समाहित
अमर समर्पण होता है
पर रहने दो
तुम ये बातें न समझ पाओगे
इक देह बन के आओगे
देह में सिमट जाओगे
आश्वासनों में छुपा
इक दर्द दे जाओगे
अपनत्व के शब्दों में गुंथी
इक बंद किताब दे जाओगे
और मैं
इंतज़ार के अंतिम "वरक़" तक
मर मर के जीती रहूंगी
साँसों के अंतिम छोर तक
तुम में
बैठकर
तुम्हें पढूंगी
तुम्हारे शब्दों में
स्वयं को आत्मसात कर
इक शब्द बन जाऊँगी
सच
कितना अच्छा होगा
तुम्हारे आश्वासनों के साथ बैठी
मैं भी
इक
बंद किताब हो जाऊंगी

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on November 23, 2017 at 12:54pm

आदरणीय विजय निकोर साहिब , सादर प्रणाम  ... सृजन के भावों को आत्मीय भावों से अलंकृत का हार्दिक आभार। 

Comment by vijay nikore on November 23, 2017 at 11:40am

//तुम में 
बैठकर 
तुम्हें पढूंगी 
तुम्हारे शब्दों में 
स्वयं को आत्मसात कर 
इक शब्द बन जाऊँगी //

वाह ! अति कोमल भाव। इस सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई, भाई सुशील जी।

Comment by Sushil Sarna on November 21, 2017 at 5:29pm

आदरणीय मो.आरिफ साहिब, आदाब .. सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया एवं सुझावों की हार्दिक आभारी है। भविष्य में इनकी पुरावृति न हो , इसका ध्यान रखने का प्रयास करूंगा। वैसे सर हिंदी में वर्ण के नीचे नुक़्ते (.) का चलन मेरी नज़र में नहीं आया हाँ उर्दू लिपि में ज़रूर है। अब चूंकि मैंने ये प्रस्तुति हिंदी में उर्दू के शब्दों को प्रयोग करते हुए लिखी है इसलिए आपको शायद वर्तनी दोष लगा हो। बहरहाल कोशिश करूंगा कि कम से कम उर्दू शब्दों का सही प्रयोग करूँ। इस गहन समीक्षात्मक प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on November 21, 2017 at 5:28pm

आदरणीय सलीम साहिब सृजन को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार। 

Comment by Sushil Sarna on November 21, 2017 at 5:28pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह जी सृजन के गहन भावों को सहमति देती आत्मीय प्रशंसा से सृजन सार्थक हुआ। हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on November 21, 2017 at 5:27pm

आदरणीय तस्दीक़ अहमद साहिब, आदाब ... सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Mohammed Arif on November 21, 2017 at 12:13pm
आलरणीय सुशील सरना जी आदाब,
बहुत सुंदर अंतर्मन की शाब्दिक अभिव्यक्ति । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । कुछ वर्तनीगत अशुद्धियों की ओर ध्यान दिलाना चाहूँगा जैसे:-बाकी/बाक़ी,सागर/साग़र, गोहर/गौहर,नशवरता/नश्वरता,रहूंगी/रहूँगी, पढूंगी/पढ़ूँगी,किताब/क़िताब आदि ।
Comment by SALIM RAZA REWA on November 21, 2017 at 9:19am
वाह...
जनाब सुशील सरना साहिब ,बहुत ही आकर्षक और सुन्दर कविता हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं
Comment by नाथ सोनांचली on November 20, 2017 at 9:45pm
आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। बहुत गहरी सोच को प्रतिबिंबित करती अतुकांत, पढ़ते पढ़ते भावों में खोने को बरबस खिंचती।बहुत बहुत बधाई इस अतुकांत पर।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on November 20, 2017 at 9:09pm
जनाब सुशील सरना साहिब ,बहुत ही आकर्षक और सुन्दर कविता हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं

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