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अभी दिल की गिरफ्तारी से बचिए

1222 1222 122
हरम में अब समझदारी से बचिए ।
हसीनों की नशातारी से बचिए ।।

अगर ख्वाहिश जरा सी है सुकूँ की ।
रकीबों की वफादारी से बचिए ।।

यहाँ दुश्मन से कब खतरा हुआ है ।
यहाँ अपनों की गद्दारी से बचिए ।।


नियत सबकी बड़ी खोटी दिखी है ।
नगर में आप मुख्तारी से बचिए ।।


रहेगी आपकी भी शान जिंदा ।
जरूरत है कि बेकारी से बचिए ।।


है करके कुछ दिखाने की तमन्ना ।
तो पहले अपनी खुद्दारी से बचिए ।।

तरक्की खुद चली आएगी इक दिन ।
मगर मजहब की बीमारी से बचिए ।।

वो अक्सर पीठ पर मारा है ख़ंजर ।
कभी दुश्मन की मक्कारी से बचिए ।।

हकीमों से अगर दौलत बचानी ।
मुहकमा गैर सरकारी से बचिए ।।

हजारों लोग फंदे फेकते हैं ।
नए चेहरों की इफ्तारी से बचिए ।।

बड़ी शातिर अदाएं ढूढ़तीं हैं ।
अभी दिल की गिरफ्तारी से बचिए ।।

   मौलिक अप्रकाशित 

नवीन मणि त्रिपाठी

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 28, 2017 at 6:43pm

जनाब नवीन साहिब ,ग़ज़ल की अच्छी कोशिश हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं , जनाब अजय साहिब के मश्वरे पर गौर कीजियेगा ।

Comment by Mahendra Kumar on December 27, 2017 at 10:42am

अच्छी ग़ज़ल है आ. नवीन जी. आ. अजय जी की बातों से मैं भी सहमत हूँ. हार्दिक बधाई प्रेषित है. सादर.

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 26, 2017 at 10:20pm

बहुत खूब । बधाई

Comment by Naveen Mani Tripathi on December 26, 2017 at 6:29pm

आ0 अजय तिवारी जी विशेष आभार आपकी इस्लाह अत्यंत महत्वपूर्ण लगी । अभी अविलम्ब ठीक करता हूँ ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on December 26, 2017 at 6:27pm

आ0 कबीर सर सादर आभार के साथ नमन 

Comment by Naveen Mani Tripathi on December 26, 2017 at 4:40pm

आ0 कबीर सर सादर आभार के साथ नमन 

Comment by Samar kabeer on December 26, 2017 at 2:27pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

जनाब अजय तिवारी जी की बातों का संज्ञान लें ।

Comment by Ajay Tiwari on December 26, 2017 at 1:56pm

आदरणीय नवीन जी, 

कुछ अशआर बहुत ही अच्छे हैं लेकिन कुछ अभी वक़्त मांग रहे हैं. मतले में मेरे ख्याल से 'नशातारी' के बजाय 'अदाकारी' ठीक रहेगा. 

नियत सबकी बड़ी खोटी दिखी है,'  शुद्ध शब्द 'नीयत' है. संस्कृत के 'नियत' का अर्थ दूसरा है. 

वो अक्सर पीठ पर मारा है ख़ंजर । > वो अक्सर पीठ में मारे है ख़ंजर > वो अक्सर पीठ में मारें हैं ख़ंजर
कभी दुश्मन की मक्कारी से बचिए । > जरा दुश्मन की मक्कारी से बचिए > मियां अपनों की मक्कारी से बचिए

हकीमों से अगर दौलत बचानी । >  हकीमों से है जो दौलत बचानी

छठे शेर को फिर से कहना बेहतर होगा. 

'है करके कुछ दिखाने की तमन्ना 
तो पहले अपनी खुद्दारी से बचिए'    बहुत खूब! 

हादिक बधाई. सादर  

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