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ग़ज़ल - इस उम्र में निगाह बहकती ज़रूर है

221 2121 1221 212
छुपती कहाँ है आग दहकती जरूर है ।।
यादों में उनकी आंख फड़कती जरूर है ।।

खुशबू तमाम आई है उनके दयार से ।
गुलशन की वो हवा भी महकती जरूर है ।।

बुलबुल की शोखियों की बुलन्दी तो देखिए ।
बुलबुल बहार में तो चहकती जरूर है ।।

हसरत है देखने की तो आशिक मिजाज रख ।
चहरे से हर नकाब सरकती जरूर है ।।

रहना जरा सँभल के मुहब्बत की वस्ल में ।
अक्सर हया नज़र से टपकती जरूर है ।।

मतलब परस्तियों की जमीं पे न घर बना ।
दीवार एक दिन में दरकती जरूर है ।।

जाना अगर है दिल मे तो पहरों पे हो नज़र ।
दरबान की भी आंख झपकती जरूर है ।।

आशिक की हो पहुँच में यहां हुस्ने गुल तमाम ।
गुल से लदी हो शाख़ लचकती जरूर है ।।

कमसिन अदा को देख ज़माना ये कह रहा ।
इस उम्र में निगाह बहकती जरूर है ।।

गायब है उसका चैन उड़ी नींद रात की ।
पाज़ेब कोई रात खनकती ज़रूर है ।।

आती क़ज़ा से पहले ही इजहारे इश्क़ हो ।
प्यासी रही जो रूह भटकती जरूर है ।।

-- नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by ram shiromani pathak on January 1, 2018 at 8:28am

नवीन भाई बहुत ही प्यारी ग़ज़ल हुई है।।बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Naveen Mani Tripathi on December 30, 2017 at 3:22pm

आ0राम अवध विश्वकर्मा साहब सादर आभार । 

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on December 30, 2017 at 2:48pm

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है. रदीफ काफिये का निर्वहनन सलीके से हुआ है।आदर्णीय  बधाई

Comment by Naveen Mani Tripathi on December 29, 2017 at 12:12pm

आ0 काली पद साहब सादर आभार । अवश्य कबीर सर और अजय तिवारी सर के कमेंट की प्रतीक्षा मुझे भी है ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on December 29, 2017 at 12:10pm

आ0 सुशील सरना साहब विशेष आभार

Comment by Sushil Sarna on December 28, 2017 at 7:20pm

छुपती कहाँ है आग दहकती जरूर है ।।
यादों में उनकी आंख फड़कती जरूर है ।।

खुशबू तमाम आई है उनके दयार से ।
गुलशन की वो हवा भी महकती जरूर है ।।

वाह आदरणीय वाह क्या गज़ब के अशआर कहे हैं आपने। इस बेहतरीन अहसासों की ग़ज़ल के लिए दिल से बधाई स्वीकार करें।

Comment by Kalipad Prasad Mandal on December 28, 2017 at 5:05pm

आ नवीन मणि जी  ग़ज़ल बहुत उम्दा हुई है | मुबारकबाद कुबूल करे | बाकि गुणी जन बताएँगे |

कृपया ध्यान दे...

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