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ग़ज़ल - तेरी आँखों में अभी तक है अदावत बाकी

2122 1122 1122 22


तेरी आँखों में अभी तक है अदावत बाकी ।
है तेरे पास बहुत आज भी तूुहमत बाकी ।।

इस तरह घूर के देखो न मुझे आप यहाँ ।
आपकी दिल पे अभी तक है हुकूमत बाकी ।।

तोड़ सकता हूँ मुहब्बत की ये दीवार मगर।
मेरे किरदार में शायद है शराफत बाकी ।।

ऐ मुहब्बत तेरे इल्जाम पे क्या क्या न सहा ।
बच गई कितनी अभी और फ़ज़ीहत बाकी ।।

मुस्कुरा कर वो गले  मिलने  लगा  है  मुझसे ।
कुछ तो होगी ही उसे खास ज़रूरत बाकी ।।


बात होती ही रही आपकी शब भर उनसे ।
रह गई कैसे भला और शिकायत बाकी ।।

वो मुलाकात पे बैठा है लगाकर पहरा ।

तेरे दरबार में कुछ रह गयी रिश्वत बाकी ।।

कौन कहता है वो मासूम बहुत है यारों ।
उसकी फितरत में बला की है शरारत बाकी ।।


इश्क़ फरमाए भला कौन हिमाकत करके ।
आप रखते हैं कहाँ गैर की इज़्ज़त बाकी ।।

मेरे साकी तू अभी और चला दौर यहाँ ।
पास मेरे है अभी और भी दौलत बाकी ।।


--- नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अ प्रकाशित

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 16, 2018 at 7:08am

अच्छी गजल हुई है ,हार्दिक बधाई आ.

Comment by Naveen Mani Tripathi on January 15, 2018 at 11:12am

आ0 सुरेंद्र नाथ सिंह जी सादर आभार ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on January 15, 2018 at 6:07am

आद0 नवीन मणि जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही, आद0 समर साहब के इस्लाह से उत्तम। समर सहाब को नमन और आपको इस ग़ज़ल पर बधाई

Comment by Samar kabeer on January 13, 2018 at 1:58pm

अब ठीक है ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on January 13, 2018 at 1:51pm

आ0 कबीर सर सादर नमन के साथ आभार । आपका सुझाव अत्यंत महत्वपूर्ण होता है । मैंने सुधार किया है ।

 

Comment by Samar kabeer on January 12, 2018 at 5:40pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

मतले के सानी मिसरे में 'तोहमत' को "तुहमत" कर लें ।

दूसरे शैर के ऊला में 'बारहा' की जगह " इस तरह" कर लें ।

तीसरे शैर का सानी बह्र में नहीं है,'ज़मीर' की जगह "किरदार" कर लें ।

5वें शैर का ऊला यूँ करें :-

'मुस्कुरा कर वो गले मिलने लगा है मुझसे"

और सानी में 'कोई' की जगह "उसे" कर लें ।

छटा शैर हटा दें ।

आठवें का ऊला यूँ करें:-

'वो मुलाक़ात पे बैठा है लगा कर पहरा"

और सानी यूँ करें:-

'तेरे दरबार में कुछ रह गई रिश्वत बाक़ी'

Comment by narendrasinh chauhan on January 12, 2018 at 3:57pm

खूब सुन्दर रचना 

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