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ख़्वाब के साथ ...

न जाने कब
मैं किसी
अजनबी गंध में
समाहित हो गयी

न जाने कब
कोई अजनबी
इक गंध सा
मुझ में समाहित हो गया

न जाने
कितनी कबाओं को उतार
मैं + तू = हम
के पैरहन में
गुम हो गए


और गुम हो गए
सारे
अजनबी मोड़
हकीकत की चुभन को भूल
ख़्वाबों की धुंध में
कभी अलग न होने के
ख़्वाब के साथ

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 545

Comment

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Comment by Sushil Sarna on January 27, 2018 at 7:54pm

आदरणीय  vijay nikore  जी ,  सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by vijay nikore on January 18, 2018 at 8:39am

आपकी रचना सदैव खुशी न दे, ऐसा हुआ नही। हार्दिक बधाई, सुशील जी।

Comment by Sushil Sarna on January 16, 2018 at 6:22pm

आदरणीय समर कबीर साहिब , आदाब ... सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on January 16, 2018 at 6:22pm

आदरणीय मो.आरिफ साहिब, आदाब ... सृजन पर आपकी मधुर प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Samar kabeer on January 16, 2018 at 2:14pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Mohammed Arif on January 16, 2018 at 11:54am

वाह! वाह!! बहुत ही बढ़िया रचना आदरणीय सुशील सरना जी । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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