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ग़ज़ल नूर की--ये अजब क़िस्सा रहा है ज़िन्दगी में

२१२२/ २१२२/२१२२ 
.
ये अजब क़िस्सा रहा है ज़िन्दगी में
याद आता है मुझे वो बेख़ुदी में.
.
काश उन के लब मेरे होंठों को चूमें
मूँद कर आँखें.. पडा हूँ चाँदनी में.
.
जब रिहाई की कोई सूरत नहीं है
लुत्फ़ लेना सीख ही लूँ बेबसी में.
.
एक जुगनू जो लड़ा था तीरगी से    
याद कर लेना उसे भी रौशनी में.
.
याद कर के अपने माज़ी के पलों को
बहते हैं आँखों से आँसू हर ख़ुशी में.
.
आपका अहसान मुझ पर यह बहुत है
आप ने है दर्द घोला शाइरी में.
.
सोचने के वक़्त तुम को सोचता हूँ
और बाक़ी कट रही है नौकरी में.  
.
लुत्फ़ मिलता है बहुत ग़मगीन रहकर
जैसे कुछ बाक़ी नहीं हो ज़िन्दगी में.
.
निलेश "नूर"
मौलिक अप्रकाशित 

Views: 860

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 25, 2018 at 7:52am

शुक्रिया आ तस्दीक अहमद साहब 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 25, 2018 at 7:51am

शुक्रिया आ. बसंत कुमार जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 25, 2018 at 7:51am

शुक्रिया आ. महेंद्र कुमार जी 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on January 18, 2018 at 10:20pm

जनाब नीलेश साहिब , अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ

Comment by बसंत कुमार शर्मा on January 18, 2018 at 9:52pm

वाह शानदार

Comment by Mahendra Kumar on January 17, 2018 at 7:33pm

बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल है आ. निलेश सर. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Nilesh Shevgaonkar on January 17, 2018 at 3:21pm

शुक्रिया आ. मण्डल जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on January 17, 2018 at 3:21pm

शुक्रिया आ. समर सर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on January 17, 2018 at 3:20pm

शुक्रिया आ. सलीम साहब 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on January 17, 2018 at 3:20pm

शुक्रिया आ. अजय तिवारी जी ..दरअसल दो तरह के मिसरे दिमाग में थे,,पढ़ा कुछ, गुनगुनाया कुछ और उँगलियों ने टाइप किया कुछ..
अभी   ठीक कर लेता हूँ..
सादर 

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