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समय का फेर(लघु कथा)

कभी उनकी खूब चलती थी।कोर्ट-कचहरी सब वही थे।और सरकार तो थे ही।सचिव लोग गाहे-बेगाहे जरूरी फाइलें लेकर उनके आवास जाते,तो झिड़की मिलती।टका-सा मुँह लिए लौट आते।अपने नसीब को रोते कि कहाँ से कहाँ कलक्टर हुए,अर्दली ही रहते तो बेहतर होता।चैता के ताल पर 'रे ठीक से नाच बुरबक' तो न सुनना पड़ता। सुरती ठोंककर हाकिम को तो नहीं खिलानी पड़ती। उन्हें अपने लिए 'हाकिम,साहिब' जैसे शब्द गाली लगने लगे थे।वैसे अब हाकिम-सरकार के लोग इन लोगों को अर्दली जैसे ही समझते थे,आर्डर देते थे।
फिर समय ने करवट बदली। साहब जी घोटालों में फँस गये।कचहरी का चक्कर जारी है।किसी में सजा,तो किसी में सुनवाई चल रही है।कहते सुने गये कि बीमारी का लिहाज कर सजा कम दी जाय।पर यह क्या,उम्मीद से साल,छः माह ज्यादा की ही मुनादी हो गयी।देवी-देवता गुहाराये जा रहे हैं,अपने शरीर का कीचड़ औरों पर फेंका जा रहा है।पर जैसे धूल उड़ाइये तो आप ही पर पड़ती है,वैसे बेचारे कीचड़-कीचड़ हुए जा रहे हैं।खैर वक्त ने तमीज सीखा दिया है,उन्हें 'मीलार्ड' वगैरह कहने आ गया है।लोगों को यह कहते सुनकर कि अपना किया औलाद पर आता है,अधनंगा भिखारी कहने लगा,'सच है, ससुरे की औलादें भी किसी काम की न रहीं।सब झमेले-घोटाले की भेंट चढ़ रही हैं।
-ठीक ही तो कहते हो',गंगूबोला।
-‎अरे इतना ही नहीं न।बहुतों की 'हाय' लगी है। ऊपर वाले के यहाँ देर भले हो,पर हिसाब पक्का होता है',लँगड़ा भिखारी बोला,जो साहब जी के सामाजिक-न्याय के दौर में सच कहने की खातिर अपना एक पाँव गँवा चुका था।उनके गुर्गों ने उसका एक पैर इसलिए काट दिया था,क्योंकि वह अपने जमीर के हिसाब से वोट देना चाहता था।
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Mahendra Kumar on January 23, 2018 at 7:23pm

समय अच्छे-अच्छों का हिसाब कर देता है. अच्छी लघुकथा है आ. मनन जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Manan Kumar singh on January 18, 2018 at 7:53pm

शुक्रिया।

Comment by surender insan on January 18, 2018 at 12:45pm

बहुत अच्छी रचना की आपने जी। बहुत बहुत बधाई हो जी।

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