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2122 2122 212


बेखुदी की जिंदगी है आजकल ।
खूब सस्ता आदमी है आजकल ।।

जी रहे मजबूरियों में लोग सब।
महफिलों में ख़ामुशी है आजकल ।।

लग रही दूकान अब इंसाफ की ।
हर तरफ़ कुछ ज़्यादती है आजकल।।

छोड़ कर तन्हा मुझे मत जाइए ।
कुछ जरूरत आपकी है आजकल ।।

अब नहीं मिलता कोई मुझसे यहां।
बर्फ रिश्तों पर जमी है आजकल ।।

आपके हर कातिलाना वार से ।
फैल जाती सनसनी है आजकल ।।

मैकदे में शोर बरपा है बहुत ।
जाम पर रस्सा कसी है आजकल।।

रिन्द खोते जा रहे सारा अदब ।
जाने कैसी तिश्नगी है आजकल।।

हुस्न पर पर्दा न इतना कीजिये ।
हुस्न की ही बन्दगी है आजकल ।।


क्या भरोसा रह गया है यार का ।
वह निभाता दुश्मनी है आजकल ।।

अब नहीं जाना मुझे उसकी गली ।
वह कहाँ पहचानती है आजकल।।

इक हसीना खेलने के वास्ते ।
दिल हमारा मांगती है आजकल ।।


---नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by मनोज अहसास on January 22, 2018 at 12:02pm

बहुत खूब आदरणीय

Comment by बसंत कुमार शर्मा on January 20, 2018 at 6:33pm

खूबसूरत ग़ज़ल हुई है आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 20, 2018 at 3:23pm

बहुतखूब बहुतखूब आदरणीय त्रिपाठी जी..

Comment by Naveen Mani Tripathi on January 20, 2018 at 1:16pm

आ0 मुहम्मद आरिफ साहब तहे दिल से शुक्रिया ।

Comment by Mohammed Arif on January 20, 2018 at 7:54am

वाह! वाह!! मज़ा आ गया ! मज़ा आ गया !!  बहुत ही उम्दा ग़ज़ल कही । शोर भी है, शिकवा भी है , ताज़गी भी और सामयिकता का पुट भी । हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी ।

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