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स्वप्न का जो नाभिकी ये संलयन प्रारम्भ है----ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

स्वप्न का जो नाभिकी ये संलयन प्रारम्भ है

क्या किसी तारे का फिर से नव सृजन प्रारम्भ है

इस जगत को श्रेष्ठतम रचना समर्पित कर सकूँ

प्रति निशा मसि शब्द निद्रा का हवन प्रारम्भ है

मन-जगत घर्षण से अंतस में अनल जो है प्रकट

भावनाओं का उसी से आचमन प्रारम्भ है

लेखनी नें स्वयं से संकल्प इक धारण किया

एकता के भाव का सो संवहन प्रारम्भ है

चक्षुओं पर जो लगा कर घूमते चश्मा उन्हें

ताप तो सहना पड़ेगा ऊष्णन प्रारम्भ है

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 8, 2018 at 4:12pm

आदरणीय सोमेश जी सादर अभिवादन और हार्दिक आभार

Comment by somesh kumar on February 8, 2018 at 10:16am

इस जगत को श्रेष्ठतम रचना समर्पित कर सकूँ

प्रति निशा मसि शब्द निद्रा का हवन प्रारम्भ है

 यह कवि की नियति है यही उसकी तपस्या है ,वो रात भर जागकर अपनी नींद को हवन करके बेहतर शब्दों से भावनाएं रचता है,

बधाई पंकज भाई

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 8, 2018 at 9:36am

आदरणीय ब्रजेश जी बहुत बहुत आभार

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 8, 2018 at 9:34am

आदरणीय सुरेंद्र जी आपको हार्दिक आभार, मेरे प्रयास को मान देने के लिए बहुत बहुत आभार

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 7, 2018 at 9:01pm

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय पंकज वाह बेहतरीन...

Comment by नाथ सोनांचली on February 7, 2018 at 7:47pm

आद0 पंकज जी सादर अभिवादन। इतनी शुद्ध हिंदी में ग़ज़ल मुझे आपकी ही मिलती है। अच्छे अच्छे खयाल लाये हैं आप। बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 7, 2018 at 10:55am

आदरणीय अजय जी सादर आभार

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 7, 2018 at 10:55am

आदरणीय बसन्त जी बहुत बहुत आभार

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 7, 2018 at 10:54am

आदरणीय नरेंद्र जी सादर आभार

Comment by Ajay Kumar Sharma on February 6, 2018 at 10:58pm

वाह शानदार रचना...

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