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स्वप्न का जो नाभिकी ये संलयन प्रारम्भ है----ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

स्वप्न का जो नाभिकी ये संलयन प्रारम्भ है

क्या किसी तारे का फिर से नव सृजन प्रारम्भ है

इस जगत को श्रेष्ठतम रचना समर्पित कर सकूँ

प्रति निशा मसि शब्द निद्रा का हवन प्रारम्भ है

मन-जगत घर्षण से अंतस में अनल जो है प्रकट

भावनाओं का उसी से आचमन प्रारम्भ है

लेखनी नें स्वयं से संकल्प इक धारण किया

एकता के भाव का सो संवहन प्रारम्भ है

चक्षुओं पर जो लगा कर घूमते चश्मा उन्हें

ताप तो सहना पड़ेगा ऊष्णन प्रारम्भ है

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on February 6, 2018 at 3:30pm

वाह बहुत सुंदर 

Comment by narendrasinh chauhan on February 6, 2018 at 10:29am

आदरणीय, खूब सुन्दर रचना 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 5, 2018 at 8:24pm

आदरणीय सुशील सरन सर बहुत-बहुत आभार । आप से मिली प्रतिक्रिया मेरे मनोबल को बढ़ा रही है

Comment by Sushil Sarna on February 5, 2018 at 8:08pm

चक्षुओं पर जो लगा कर घूमते चश्मा उन्हें

ताप तो सहना पड़ेगा ऊष्णन प्रारम्भ है

वाह आदरणीय पंकज जी वाह ... इस शानदार भावों की इस शानदार ग़ज़ल के लिए दिल से बधाई। शाब्दिक सौंदर्य इसकी प्रमुख विशेषता है। पुनः हार्दिक बधाई।

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