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मेरा दर्द पता रहता है

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मुद्दत से उलझा रहता है ।

यह मन कब तन्हा रहता है ।।

मिलता है अक्सर जो हंसकर ।

वो गम को पीता रहता है ।।

जो गुलाब भेजा था तुमने ।

वो दिल मे खिलता रहता है ।।

कब आओगे मेरे घर तुम ।

खत में वो लिखता रहता है ।।

मुझसे मेरा हाल न पूछो ।

दिल मेरा रोता रहता है ।।

कुछ तो जलता है तेरे घर ।

रोज़ धुंआ उठता रहता है ।।

शायद उसको इश्क हुआ है ।

मुझसे वो मिलता रहता है ।।

जख्म मिले हैं मुझको उनसे।

जिनसे ज़ख़्म छुपा रहता है ।।

आंख चुराने वालों को ही ।

मेरा दर्द पता रहता है ।।

प्रेम दिवस पर भूल न जाना।

मेरा मन घुटता रहता है ।।

एक जमाने से वो मुझको।

चुपके से पढ़ता रहता है ।।

देख मुसाफ़िर सँभल के चलना ।

प्यार सदा अंधा रहता है ।।

परवानों के मरघट खातिर ।

एक दिया जलता रहता है ।।

नवीन मणि त्रिपाठी मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Naveen Mani Tripathi on February 13, 2018 at 11:28am

आ0 मो0 आरिफ साहब आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on February 13, 2018 at 11:27am

आ0 लक्ष्मण धामी साहब शुक्रिया ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on February 13, 2018 at 11:27am

आ0 तस्दीक अहमद खान साहब शुक्रिया ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 13, 2018 at 11:13am

आ. भाई नवीन जी , सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 11, 2018 at 5:02pm

जनाब नवीन साहिब ,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें। शेर7 ऐब-तकाबुले रदीफैंन हो गया , यूँ करसकते हैं "इश्क़ हुआ है शायद उसको "

आखरी शेर में बात साफ नहीं हो सकी , "यूँ करके देखिए "मर घट पर भी ए परवानों "

Comment by Mohammed Arif on February 11, 2018 at 7:58am

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,

                       छोटी बह्र में उम्दा ग़ज़ल । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें । बाक़ी गुणीजन  अपनी राय देंगे ।

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