For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

221 2121 1221 212


इस बेखुदी में आप भी जाते कहाँ कहाँ ।
दिल के हजार ज़ख्म दिखाते कहाँ कहाँ ।।

खानाबदोश सा लगा आलम जहान का ।
रातें तमाम आप बिताते कहां कहां ।।

मुश्किल सफर में अलविदा कह कर चले गए ।
यूँ जिंदगी का साथ निभाते कहाँ कहाँ ।।

चहरा हो बेनकाब न जाहिर शिकन भी हो।
क़ातिल का हम गुनाह छुपाते कहाँ कहाँ ।।

कुछ तो हमें भी फैसला लेना था जुल्म पर ।
नजरें हया के साथ झुकाते कहाँ कहाँ ।।

आंखे किसी के, हुस्न पे मुझको फिदा मिलीं ।
दरबान इस चमन में बिठाते कहाँ कहाँ ।।

शायद अदा में दम था परिंदे कफ़स में हैं ।
यूँ आसमान सर पे उठाते कहाँ कहाँ ।।

दैरो हरम से दूर हमें तो खुदा मिले ।
मस्जिद में रब है लोग बताते कहाँ कहाँ ।।

हमको नसीहतें वों भुलाने की दे गए ।
उनकी निशानियों को मिटाते कहाँ कहाँ ।।

बदनाम हो न जाये ये बस्ती के हम थे चुप ।
जुल्मो सितम का दर्द सुनाते कहाँ कहाँ ।।

उसको तो डूब जाना था आंखों में आपके ।
उसका वजूद आप बचाते कहाँ कहाँ ।।

जलता मिला है शह्र तुम्हारे उसूल पर ।
उल्फत की तुम भी आग लगाते कहाँ कहाँ ।।


--नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

Views: 497

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 16, 2018 at 10:38pm

आ0 लक्ष्मण धामी साहब हार्दिक आभार

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 16, 2018 at 10:37pm

आ0 हर्ष महाजन साहब तहेदिल से शुक्रिया 

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 16, 2018 at 10:36pm

आ0 कबीर सर सादर नमन । अति महत्वपूर्ण इस्लाह हेतु हार्दिक आभार । अपेक्षित सुधार कर दिया है सर ।

Comment by Harash Mahajan on March 15, 2018 at 6:50pm

आ० नवीन मनी जी आदाब | हर शेर को पढ़कर अच्छा लगा |
बहुत ही सुंदर बांधे हैं आपने अपने अहसास |

"आंखे किसी के, हुस्न पे मुझको फिदा मिलीं ।
दरबान इस चमन में बिठाते कहाँ कहाँ ।।"...आरी सुंदर


बधाई |

सादर |


Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 14, 2018 at 7:22pm

आ. नवीन जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on March 14, 2018 at 12:29pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

दूसरे शैर के ऊला मिसरे में 'आलम' और ' जहान' एक ही है, इस  शैर को यूँ कर सकते हैं :-

'ख़ानाबदोश जैसे हैं हम इस जहान में

रातें तमाम अपनी बिताते कहाँ कहाँ'

छटे शैर के ऊला में 'मुझको' की जगह "हमको" कर लें ।

8वें शैर के ऊला में 'मिले' को " मिला" कर लें ।

11वें के ऊला में 'आपके' की जगह "आपकी" कर लें ।

निवेदन है कि ज़ियादा अशआर कहें तो उन पर नम्बर डाल दिया करें ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 14, 2018 at 11:57am

आ0 कबीर सर को नमन 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
yesterday
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Jul 26
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Jul 24
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Jul 21

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service