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इस बेखुदी में आप भी जाते कहाँ कहाँ ।
दिल के हजार ज़ख्म दिखाते कहाँ कहाँ ।।

खानाबदोश सा लगा आलम जहान का ।
रातें तमाम आप बिताते कहां कहां ।।

मुश्किल सफर में अलविदा कह कर चले गए ।
यूँ जिंदगी का साथ निभाते कहाँ कहाँ ।।

चहरा हो बेनकाब न जाहिर शिकन भी हो।
क़ातिल का हम गुनाह छुपाते कहाँ कहाँ ।।

कुछ तो हमें भी फैसला लेना था जुल्म पर ।
नजरें हया के साथ झुकाते कहाँ कहाँ ।।

आंखे किसी के, हुस्न पे मुझको फिदा मिलीं ।
दरबान इस चमन में बिठाते कहाँ कहाँ ।।

शायद अदा में दम था परिंदे कफ़स में हैं ।
यूँ आसमान सर पे उठाते कहाँ कहाँ ।।

दैरो हरम से दूर हमें तो खुदा मिले ।
मस्जिद में रब है लोग बताते कहाँ कहाँ ।।

हमको नसीहतें वों भुलाने की दे गए ।
उनकी निशानियों को मिटाते कहाँ कहाँ ।।

बदनाम हो न जाये ये बस्ती के हम थे चुप ।
जुल्मो सितम का दर्द सुनाते कहाँ कहाँ ।।

उसको तो डूब जाना था आंखों में आपके ।
उसका वजूद आप बचाते कहाँ कहाँ ।।

जलता मिला है शह्र तुम्हारे उसूल पर ।
उल्फत की तुम भी आग लगाते कहाँ कहाँ ।।


--नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on March 16, 2018 at 10:38pm

आ0 लक्ष्मण धामी साहब हार्दिक आभार

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 16, 2018 at 10:37pm

आ0 हर्ष महाजन साहब तहेदिल से शुक्रिया 

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 16, 2018 at 10:36pm

आ0 कबीर सर सादर नमन । अति महत्वपूर्ण इस्लाह हेतु हार्दिक आभार । अपेक्षित सुधार कर दिया है सर ।

Comment by Harash Mahajan on March 15, 2018 at 6:50pm

आ० नवीन मनी जी आदाब | हर शेर को पढ़कर अच्छा लगा |
बहुत ही सुंदर बांधे हैं आपने अपने अहसास |

"आंखे किसी के, हुस्न पे मुझको फिदा मिलीं ।
दरबान इस चमन में बिठाते कहाँ कहाँ ।।"...आरी सुंदर


बधाई |

सादर |


Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 14, 2018 at 7:22pm

आ. नवीन जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on March 14, 2018 at 12:29pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

दूसरे शैर के ऊला मिसरे में 'आलम' और ' जहान' एक ही है, इस  शैर को यूँ कर सकते हैं :-

'ख़ानाबदोश जैसे हैं हम इस जहान में

रातें तमाम अपनी बिताते कहाँ कहाँ'

छटे शैर के ऊला में 'मुझको' की जगह "हमको" कर लें ।

8वें शैर के ऊला में 'मिले' को " मिला" कर लें ।

11वें के ऊला में 'आपके' की जगह "आपकी" कर लें ।

निवेदन है कि ज़ियादा अशआर कहें तो उन पर नम्बर डाल दिया करें ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on March 14, 2018 at 11:57am

आ0 कबीर सर को नमन 

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