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वो फ़कत मुझको वहाँ का पासबाँ समझा किया (ग़ज़ल राज )

२१२२ २१२२ २१२२ २१२

वो मेरी खामोशियों को हाँ म हाँ समझा किया

मुझको धरती  और खुद को आसमाँ समझा किया

पहना जब तक सादगी और शर्म का मैंने लिबास

ये ज़माना यार  मुझको नातवाँ समझा किया

उस कहानी के सभी किरदार उसको थे अज़ीज़

बस मेरे किरदार को ही रायगाँ समझा किया

जिस्म मेरा रूह मेरी जिस चमन पर थी निसार

वो फ़कत मुझको वहाँ का पासबाँ समझा किया

जिसकी दीवारों में माज़ी सांस लेता था कभी 

यादों से भरपूर घर को वो मकाँ समझा किया

ले गई जिसके गुलों को छीनकर ज़ालिम ख़जाँ

शाख़ के उस दर्द को बस बागबाँ समझा किया

हाय  उसने ही जलाया चिलचिलाती धूप में  

भूल से अबतक जिसे वो सायबाँ समझा किया 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 19, 2018 at 8:13pm

मोहतरम जनाब तस्दीक जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ दिल से शुक्रगुजार हूँ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 19, 2018 at 8:12pm

आद० विजय निकोर जी ,ग़ज़ल पर शिरकत और सुखन नवाजी का बेहद शुक्रिया ममनून हूँ बहुत बहुत आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 19, 2018 at 8:11pm

आद० शेख उस्मानी जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई दिल से बेहद शुक्रगुजार हूँ |आगे से कठिन शब्दों के अर्थ अवश्य लिखा करुँगी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 19, 2018 at 8:10pm

आद० हर्ष महाजन जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ दिल से बेहद शुक्रगुजार हूँ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 19, 2018 at 8:09pm

आद० लक्ष्मण धामी भैया,आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका बहुत बहुत शुक्रिया | 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 19, 2018 at 8:08pm

आद० अजय तिवारी जी , आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ आपकी बात सही है उस शेर में मेरा मन्तव्य यही था .

आपका तह-ए-दिल से शुक्रिया  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 19, 2018 at 8:06pm

आद० मोहम्मद आरिफ साहब ,आपको ग़ज़ल अच्छी लगी बहुत बहुत शुक्रिया आपका ,ग़ज़ल में कुछ संशोधन  किये हैं |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 19, 2018 at 8:04pm

आद० समर भाई जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई इसके लिए दिल से शुक्रिया आपने जिन महीन बिन्दुओं की तरफ इशारा किया उनके लिए बेहद शुक्रगुजार हूँ तथा उन्ही के मद्देनजर इसमें संशोधन भी कर दिया है खू चकां शब्द का अर्थ खून चूसने वाला लिखा था एक जगह बस उसी  वजह से गलती हो गई अब उस शब्द को बदल दिया है |आपके मार्ग दर्शन के बाद ग़ज़ल में वाकई निखार आया है आपका बारम्बार शुक्रिया भाई जी \


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 19, 2018 at 8:00pm

आद० तेजवीर सिंह जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ दिल से शुक्रगुजार हूँ |

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 19, 2018 at 7:43pm

मुहतर्मा राजेश कुमारी साहिबा ,अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें । शेर 6 में शब्द ख़ज़ा को खिज़ां करलीजिये ।---सादर

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