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 मेरी चाहतें सब दहकने से पहले ।।
चले  आइये  सर  पटकने   पहले ।।

नहीं भूलती वो सुलगती सी रातें ।
मुहब्बत का सूरज चमकने से पहले ।।

सुना हूँ यहाँ हुस्न वालों की बस्ती।
मगर वो मिले कब भटकने से पहले ।।

है ख्वाहिश यही तुझको जी भर के देखूँ ।
क़ज़ा पर पलक के झपकने से पहले ।।

बहुत कोशिशें गुफ्तगू की हैं उनकी ।
अभी सर से चिलमन सरकने से पहले ।।

गुलिस्तां पे है आंधियों का सितम यह ।
गिरे गुल जमीं पर महकने से पहले ।।

यहां मैकदे में तिजारत बहुत है ।
वो दिल मांगते हैं बहकने से पहले ।।

नए जाल में अब परिंदे फँसा कर ।
सजा दे रहे वो चहकने से पहले ।।

मयस्सर हुई ही नहीं चन्द खुशियां ।
मेरे आसुओं के छलकने से पहले ।।

--- नवीन मणि त्रिपाठी।

मौलिक अ प्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 4, 2018 at 4:57pm

आदरणीय त्रिपाठी जी अच्छी ग़ज़ल कही है..बधाई

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 2, 2018 at 12:25pm

आ0 मुहम्मद आरिफ साहब सादर आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 2, 2018 at 12:25pm

आ0 तेजवीर सिंह साहब हार्दिक आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 2, 2018 at 12:24pm

आदरणीय कबीर सर सादर नमन । 

Comment by Samar kabeer on April 2, 2018 at 12:20pm

जनाब नवीन जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on April 2, 2018 at 11:48am

हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन जी। बेहतरीन गज़ल।

है ख्वाहिश यही तुझको जी भर के देखूँ ।
क़ज़ा पर पलक के झपकने से पहले ।।

Comment by Mohammed Arif on March 31, 2018 at 5:45pm

वाह! वाह!! बहुत ही प्यारी ग़ज़ल हुई है । हर मुझे पसंद है । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करेन आदरणीय नवीन मणि जी ।

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