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22  22  22  22           
अपना घाव छुपा के रखना
मन को भी समझा के रखना।1

ऊपर ऊपर जैसा भी हो
अंदर आग जला के रखना।2

और उजाला करना होगा
थोड़ा तेल बचा के रखना।3             
तीर चलेंगे जाने कितने
देखो ढ़ाल बढ़ा के रखना।4

कौन सुनेगा बातें  ढ़ब की
बाण-धनुष चमका के रखना।5

मंजिल कोई दूर नहीं है
ख्वाहिश को उमगा के रखना।6

रात अँधेरी,चंदा संगी,
रुनझुन बीन बजा के रखना।7

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on May 3, 2018 at 8:30pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय तेजवीर सिंह जी।

Comment by Manan Kumar singh on May 3, 2018 at 8:29pm

शुक्रिया जनाब आरिफ जी।

Comment by Manan Kumar singh on May 3, 2018 at 8:22pm

शुक्रिया आदरणीया नीलम जी।

Comment by Manan Kumar singh on May 3, 2018 at 8:22pm

आभारी हूँ जनाब समर जी,आदाब।

Comment by TEJ VEER SINGH on April 23, 2018 at 2:27pm

हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार जी।बेहतरीन गज़ल।

ऊपर ऊपर जैसा भी हो
अंदर आग जला के रखना।2

Comment by Mohammed Arif on April 23, 2018 at 1:47pm

आदरणीय मनन कुमार जी आदाब,

                               कठिन बह्र में बेहतरी ग़ज़ल । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की इस्लाह का संज्ञान लें ।

Comment by Neelam Upadhyaya on April 23, 2018 at 11:05am

आदरणीय मनन कुमार जी ।  खूबसूरत रचना की प्रस्तुति के लिए  बधाई स्वीकार करें। 

Comment by Samar kabeer on April 22, 2018 at 9:58am

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

तीसरे शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ देखें ।

'कौन सुनता बातें ढब की'

ये मिसरा बह्र में नहीं है,यूँ कर सकते हैं:-

'कौन सुनेगा बातें ढब की'

Comment by Manan Kumar singh on April 22, 2018 at 9:19am

बहुत बहुत शुक्रिया,नमन।

Comment by Harash Mahajan on April 22, 2018 at 9:14am

आदरणीय मनन जी आदाब ।

अति सुंदर पेशकश । बधाई ।

सादर !

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