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ग़ज़ल नूर की- बहुत आसाँ है दुनिया में किसी का प्यार पा लेना,

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२ 
.
बहुत आसाँ है दुनिया में किसी का प्यार पा लेना,
बहुत मुश्किल है ऐबों को मगर उस के निभा लेना.
.
नज़र मिलते ही उस का झेंप कर नज़रें चुरा लेना,
मचलती मौज का जैसे किसी साहिल को पा लेना.
.
बहुत वादे वो करता है मगर सब तोड़ देता है,
ये दावा भी उसी का है कि मुझ को आज़मा लेना.
.
मलंगों सी तबीयत है सो अपनी धुन में रहता हूँ   
पिये हैं रौशनी के जाम फिर ग़ैरों से क्या लेना.
.
मिलन होगा मुकम्मल जब मिलेगी बूँद सागर से
उस इक पल दरमियाँ से तुम बदन अपना हटा लेना.
.
निलेश "नूर"
मौलिक / अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 25, 2018 at 2:50pm

धन्यवाद आ. समर सर,

मैंने अपनी प्रति में  सुधार कर लिया है 
सादर 

Comment by Samar kabeer on April 25, 2018 at 2:35pm

जनाब निलेश 'नूर' साहिब आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

4थे शैर में 'तबीयत' को "तबीअत" कर लें ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 25, 2018 at 2:15pm

धन्यवाद आ, तेजवीर सिंह जी

आभार

Comment by TEJ VEER SINGH on April 25, 2018 at 12:53pm

हार्दिक बधाई आदरणीय निलेश जी।बेहतरीन गज़ल।

बहुत वादे वो करता है मगर सब तोड़ देता है, 
ये दावा भी उसी का है कि मुझ को आज़मा लेना.

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