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हर कली को अजब शिकायत है,

2122 1212 22
*************

हर कली को अजब शिकायत है,
इश्क़ करना भ्रमर  की आदत है ।

इश्क़ दरिया है उर समंदर भी,
जब तलक़ मुझमें तू सलामत है ।

गम से उभरा तो मैंने जाना ये,
गर है साया तेरा तो ज़न्नत है ।

किसको किसके लिए है हमदर्दी,
हर तरफ फैली बस अदावत है ।

जब धुआँ अपने घर से उट्ठे तो,
कर यकीं रिश्तों में सियासत है

************

मौलिक एवं अप्रकाशित

हर्ष महाजन

Views: 790

Comment

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Comment by Naveen Mani Tripathi on May 6, 2018 at 4:30pm

आ0 हर्ष महाजन साहब बहुत  सुंदर प्रस्तुति । बधाई ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 6, 2018 at 2:37pm

अच्छी ग़ज़ल कही है आदरणीय महाजन जी
बधाई 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 6, 2018 at 2:27pm

अच्छी ग़ज़ल कही है आदरणीय महाजन जी..सादर

Comment by Harash Mahajan on May 6, 2018 at 12:59pm

आपकी आमद और अनुमोदन के लिए हार्दिक आभार आदरणीय लक्ष्मण धामी जी |

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 6, 2018 at 11:07am

आ. हर्ष जी, सुंदर गजल हुई है हार्दिक बधाई ।

Comment by Harash Mahajan on May 4, 2018 at 3:20pm

आदरणीय श्याम नारायन वर्मा जी शुक्रिया |

Comment by Shyam Narain Verma on May 4, 2018 at 2:58pm
सुन्दर भावों से सजी इस गज़ल के लिए आपको बहुत बधाई। सादर,
Comment by Harash Mahajan on May 4, 2018 at 12:18pm

आदरणीय समर जी आपकी कीमती इस्लाह के लिए शुक्रिया ।

सादर ।

Comment by Samar kabeer on May 4, 2018 at 11:29am

मतले का सानी यूँ करें:-

"इश्क़ करना.... की आदत है'

Comment by Samar kabeer on May 4, 2018 at 11:17am

ठीक है ।

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