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'ग़ज़ल कहने जो बैठोगे तो नानी याद आएगी'

(चौथे शैर में तक़ाबल-ए-रदीफ़ नज़र अंदाज़ करे)

नसीहत जो बुज़ुर्गों की न मानी याद आएगी

हमें ता उम्र उनकी सरगरानी याद आएगी

मियाँ मश्क़-ए-सुख़न कर लो नहीं ये खेल बच्चों का

ग़ज़ल कहने जो बैठोगे तो नानी याद आएगी

ज़माने भर की आसाइश के जब सामाँ बहम होंगे

तुझे माँ-बाप की क्या जाँ फ़िशानी याद आएगी

जुड़ी होंगी मज़ालिम की बहुत सी दास्तानें भी

हवेली गाँव की जब ख़ानदानी याद आएगी

क़वाफ़ी जब भी आएँगे ग़ज़ल में ज़िन्दगानी के

मुझे तब "नूर"की वो 'कूड़ेदानी' याद आएगी

----

सरगरानी--नाराज़गी

मश्क़-ए-सुख़न--ग़ज़ल अभ्यास

आसाइश--आराम

जाँ फ़िशानी--मिहनत

मज़ालिम--अत्याचार

"नूर"--निलेश 'नूर'

---

'समर कबीर'

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on May 8, 2018 at 2:39pm

जनाब हरिओम श्रीवास्तव जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Hariom Shrivastava on May 7, 2018 at 11:14pm

वाहह,वाहहह,लाजवाब ग़ज़ल।

ग़ज़ल कहने जो बैठोगे तो नानी याद आएगी...वाहह,दुरुस्त फ़रमाया।

Comment by Samar kabeer on May 7, 2018 at 9:36pm

जनाब रवि शुक्ला जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on May 7, 2018 at 9:34pm

जनाब हर्ष महाजन जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on May 7, 2018 at 9:32pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,आप 'कूड़े दानी'वाले शैर तक पहुंच नहीं पाए,ख़ैर ।

ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on May 7, 2018 at 9:30pm

जनाब तेजवीर सिंह जी आदाब,सुख़न नवाज़ी और ग़ज़ल में शिर्कत के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on May 7, 2018 at 9:28pm

जनाब निलेश 'नूर' साहिब आदाब,आपका क़हक़हा इतना ही तवील होगा जानता था,क्योंकि आप एक बड़ा दिल रखते हैं ।

भाई आप बंगले की कहते हैं,मैं तो अभी तक इस ज़मीन पर झोंपड़ी भी नहीं बना सका । ताज़ी ताज़ी ग़ज़लों वाले उस्तादों से इतना गहरा रिश्ता नहीं,जितना आपसे है, हाँ कभी मौक़ा मिला तो..

ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on May 7, 2018 at 9:18pm

जनाब दिनेश कुमार जी आदाब,आजकल मंच पर निलेश जी का बड़ा सहारा है,उनसे चर्चा करने और छेड़ख़ानी में लुत्फ़ आता है ।

ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Ravi Shukla on May 7, 2018 at 5:54pm

आदरणीय समर साहब आपकी इस ग़ज़ल पर दिली मुबारकबाद पेश करता हूँ । इसका।एक शेर पहले।पढ़ा था पूरी ग़ज़ल तंक आज रसाई हुई । मुबारक 

Comment by Harash Mahajan on May 7, 2018 at 4:56pm

लाज़वाब पेशकश आपकी आदरणीय

समर कबीर जी । आपकी कलम

पूरी निगरानी पर लगता है आजकल ।

दिली मुबारकबाद सर ।

सादर ।

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