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ग़ज़ल -- ख़ुशी का पल तो मयस्सर नहीं, हैं दर्द हज़ार / दिनेश कुमार

1212--1122--1212--112
.
ख़ुशी का पल तो मयस्सर नहीं, हैं दर्द हज़ार
हमारे हिस्से में क्यों है बस इंतिज़ारे-बहार
.
कि रफ़्ता रफ़्ता थकावट बदन में आएगी
उतर ही जाएगा आख़िर में ज़िन्दगी का ख़ुमार
.
मिलेगी आख़िरी ख़ाने में मौत ही सबको
बिसाते-दह्र पे पैदल हो या हो फिर वो सवार
.
इधर जनाज़ा किसी का बस उठने वाला है
उधर दुल्हन की चले पालकी उठाए कहार
.
ग़मों की धूप भी हमको सुखों की छाँव लगे
हमारा नाम भी कर लो कलन्दरों में शुमार
.
 मुखौटा ओढ़ के चेहरे पे मुस्कुराहट का
'दिनेश' आएगा क्या तेरी शख़्सियत में निखार ?
.
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by gumnaam pithoragarhi on June 5, 2018 at 10:08pm
वाह बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है वह,,,,, बधाई
Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 4, 2018 at 7:36pm

बहुत ख़ूब आ. दिनेश भाई,
अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 4, 2018 at 12:52am

आदरणीय भाई दिनेश जी, सुंदर गजल हुयी है हार्दिक बधाई ।

Comment by Mahendra Kumar on June 2, 2018 at 7:24pm

वाह! क्या ख़ूब ग़ज़ल कही है आपने आदरणीय दिनेश जी. हर शेर ख़ूबसूरत है. इस लाजवाब ग़ज़ल के लिए हार्दिक प्रेषित है आदरणीय. सादर.

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 2, 2018 at 10:10am

बेहतरीन गजल 

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