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ग़ज़ल --- ख़ुद-परस्ती का दायरा क्या था / दिनेश कुमार

2122---1212---22

ख़ुद-परस्ती का दायरा क्या था
मैं ही मैं था, मेरे सिवा क्या था

.

झूठ बोला तो बच गई गरदन
हक़-बयानी का फ़ाएदा क्या था

.

चाह मंज़िल की थी निगाहों में
ठोकरें क्या थीं आबला क्या था

.

पर निकलते ही थे उड़े ताइर !
ये रिवायत थी, सानेहा क्या था

.

दर्द, ग़ुस्सा, मलाल, मजबूरी
आख़िर उस चश्मे-तर में क्या क्या था

.

क्यों मैं बर्बादियों का सोग करूँ
जब मैं आया, यहाँ मेरा क्या था

आग पानी हवा ज़मीन फ़लक
पेश-तर दहर के बता क्या था

.

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by gumnaam pithoragarhi on July 19, 2018 at 4:27pm

वाह खूब सूरत ग़ज़ल के लिए बधाई .. .. 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on July 18, 2018 at 10:18pm

जनाब दिनेश साहिब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं l शेर 4 में शब्द "सानेहा" को "सानिहा  "कर लें l

Comment by Sushil Sarna on July 17, 2018 at 5:55pm

आदरणीय निशब्द हूँ आपकी इस गहन भावों की अभिव्यक्ति वाली बेहतरीन ग़ज़ल पर। हार्दिक हार्दिक बधाई सर।

Comment by vijay nikore on July 17, 2018 at 2:04pm

अच्छी गज़ल के लिए बधाई

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 17, 2018 at 9:35am

आ. भाई दिनेश जी, बहुत अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on July 17, 2018 at 8:11am

बहुत खूब आ. दिनेश जी 
बहुत बहुत बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on July 14, 2018 at 11:02am
बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें ।  सादर 
Comment by Ram Awadh VIshwakarma on July 14, 2018 at 8:10am

झूठ बोला तो बच गई गरदन

हकबयानी का फायदा क्या था।

क्या कहने वाह बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है। हर शेर बोलता हुआ। बधाई 

Comment by Ajay Tiwari on July 14, 2018 at 6:09am

आदरणीय दिनेश जी, आपके अपने ख़ास अंदाज़ के उम्दा अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई. 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 13, 2018 at 6:04pm

बहुतखूब बहुतखूब आदरणीय..बेहतरीन ग़ज़ल

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