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ग़ज़ल --- इक फ़रिश्ता है मेहरबाँ मुझ पर / दिनेश कुमार / ( इस्लाह हेतु )

2122---1212---22
.
जो भी सोचूँ, उसी पे निर्भर है
मेरी दुनिया तो मेरे भीतर है
.
इक फ़रिश्ता है मेहरबाँ मुझ पर
स्वर्ग से ख़ूब-तर मेरा घर है
.
जिसमें जज़्बा है काम करने का
कामयाबी उसे मयस्सर है
.
जीत कैसे मिली, है बेमानी
जो भी जीता, वही सिकन्दर है
.
कोई क़तरा भी भीक में माँगे
और हासिल किसी को सागर है
.
ज़ह्र-आलूदा इन हवाओं में
साँस लेना भी कितना दूभर है
.
हाँ, ये जादूगरी है लफ़्ज़ों की
( हाँ, ये अल्फ़ाज़ की है जादूगरी )
शायरी ओक में समन्दर है
.
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Mahendra Kumar on May 28, 2018 at 11:31am

लाजवाब ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए आदरणीय दिनेश जी. सादर.

Comment by राज लाली बटाला on May 24, 2018 at 7:51am

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है। हार्दिक बधाई

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 23, 2018 at 7:01pm

आ. भाई दिनेश जी , अच्छी गजल हुयी है हार्दिक बधाई ।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 23, 2018 at 6:15pm

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है। हार्दिक बधाई

Comment by दिनेश कुमार on May 21, 2018 at 5:09pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ.  श्याम नारायण वर्मा जी। इनायत।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 21, 2018 at 3:41pm

आ. दिनेश जी,
भरपूर और मुकम्मल ग़ज़ल हुई है..बहुत बहुत बधाई ..


Comment by Shyam Narain Verma on May 21, 2018 at 10:51am
 इस सुंदर ग़ज़लक़े लिए हार्दिक बधाई

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