For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

जिंदगी की उधेड़बुन (लघुकथा )

सुबह आठ बजे से उसका साईकल इस एवन्यु में घूम रहा था । उसके भोंपू की आवाज़ एवन्यु के हर कोने तक पहुंच चुकी थी।
मगर न कोठी से कोई भी औरत न ही माँ के साथ बच्चा बाहर आया। उसके साईकल पर लगे बड़े, छोटे गुबारे, छोटी बड़ी कार या कोई बजाने वाले खिलौने सभी उस की तरफ झाक रहे थे । दो घंटे हो गए थे इस एवन्यु दाखल हुए। साईकल की रफ्तार भी धीमी हो चली थी। चेहरा उदास और आँखों में नमी बढने लगी अचानक ही उस ने इक कोठी के आगे साईकल आ लगाई, इक बार बेल्ल बजाई कोई जवाब नहीं आया। उसने फिर बेल्ल बजाई। थोड़ी देर बाद इक बाऊ जी बाहर आये।
“सर जी, आप कोई खिलौना खरीद लें, कोई ग्राहक अभी नहीं मिला, दो घंटे हो गए हैं।", खिलौने बेचने वाले बच्चे ने कहा ।
“मगर हमारे तो कोई बच्चा ही नहीं किस लिए हम”, लेंगे, बाऊ जी ये कह गेट बंद करने लगे।
“सर जी, खरीद लीजिए न, मेरी माँ बीमार है, बच्चे ने फिर कहा ।“
बाऊ जी ने धीरे से गेट बंद किये बिना अंदर दाखिल हुए और थोड़ी देर बाद बाऊ जी ने उस के हाथ में कुछ पकड़ा दिया।
“ये क्या, बाऊ जी ने खुद से सवाल किया, क्या ऐसे हल हो जायेगा उसकी समस्या का।“
बच्चा साईकल चला आगे बढ़ गया और बाऊ जी इसी उधेड़बुन गुम हुआ उसके साईकल चलाते पैरों की तरफ देखता रहा।

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 623

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 13, 2018 at 5:39pm

बहुत ही संवेदनशील लघु कथा हुई आदरणीय..लेकिन आखरी दो पंक्तियों में कसावट की कमी लगी..

Comment by Samar kabeer on July 11, 2018 at 11:25am

जनाब मोहन जी आदाब,लघुकथा का प्रयास अच्छा हुआ है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by मोहन बेगोवाल on July 9, 2018 at 6:35pm

  

सुबह आठ बजे से उसका साईकल इस एवन्यु में घूम रहा था । उसके भोंपू की आवाज़ एवन्यु के हर कोने तक पहुंच चुकी थी।
मगर न कोठी से कोई भी औरत न ही माँ के साथ बच्चा बाहर आया। उसके साईकल पर लगे बड़े, छोटे गुबारे, छोटी बड़ी कार या कोई बजाने वाले खिलौने सभी उस की तरफ झाँक रहे थे । दो घंटे हो गए थे इस एवन्यु दाखल हुए। साईकल की रफ्तार भी धीमी हो चली थी। चेहरा उदास और आँखों में नमी बढने लगी अचानक ही उस ने इक कोठी के आगे साईकल आ लगाई, इक बार बेल्ल बजाई कोई जवाब नहीं आया। उसने फिर बेल्ल बजाई। थोड़ी देर बाद इक बाऊ जी बाहर आये।
“सर जी, आप कोई खिलौना खरीद लें, कोई ग्राहक अभी नहीं मिला, दो घंटे हो गए हैं।", खिलौने बेचने वाले बच्चे ने कहा ।
“मगर हमारे तो कोई बच्चा ही नहीं किस लिए हम लेंगे, तब बाऊ जी ये कह गेट बंद करने लगे।
“सर जी, खरीद लीजिए न, मेरी माँ बीमार है, बच्चे ने फिर कहा ।“
बाऊ जी का ध्यान घर में काम करने वाली के बच्चे की तरफ गया और धीरे से गेट बंद किये बिना वह अंदर दाखिल हुए और थोड़ी देर बाद बाऊ जी ने उस के हाथ में कुछ पकड़ा दिया।
“ये क्या, बाऊ जी ने खुद से सवाल किया, क्या ऐसे हल हो जायेगा उसकी समस्या का।“
बच्चा साईकल चला आगे बढ़ गया और बाऊ जी इसी उधेड़बुन गुम हुआ उसके साईकल चलाते पैरों की तरफ देखता रहा।

Comment by babitagupta on July 9, 2018 at 3:17pm

बच्चे के स्वाभिमान की रक्षा के लिए  और उसकी सहायता करने के लिए खिलौना खरीदना फिजूल था तो घर का कुछ काम कराकर ,उसकी सहायता की जा  सकती थी.,वैसे कहानी बहुत कुछ आज की व्यवस्था के नजदीक  दिखाई देती हैं.उम्दा रचना के लिए आर्थिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी।

Comment by Neelam Upadhyaya on July 9, 2018 at 1:03pm

 हाथ  में  कुछ पकड़ा देने से तो बच्चे के  स्वाभिमान की रक्षा नहीं हुई ।  हाँ, कुछ सहायता अवश्य हो जाएगी, उसकी माँ के  इलाज में।  लेकिन मेरे विचार से  अच्छा  होता अगर  बच्चे से कोई खिलौना खरीद  कर "कुछ" दिया गया होता ।  अच्छी लघुकथा की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।  

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। चौपाइयों पर उपस्थिति, स्नेह और मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। आपकी…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"प्रस्तुति का सहज संशोधित स्वरूप।  हार्दिक बधाई"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, प्रदत्त चित्र को आपने पूरे मनोयोग से परखा है तथा अंतर्निहित भावों को…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी, आपने प्रस्तुति के माध्यम से प्रदत्त चित्र को पूरी तरह से शाब्दिक किया है…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी, आपकी प्रस्तुति का हार्दिक धन्यवाद  परन्तु, रचना सोलह मात्राओं खे चरण…"
Sunday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण भाईजी, चौपाई छंद में आपने प्रदत्त चित्र को उपयुक्त शब्द दिये हैं. सुगढ़ रचना के…"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। चौपाइयों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार। तुकांतता के दोष में…"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अखिलेश जी, सादर अभिवादन। चौपाइयों पर उपस्थिति, स्नेह और मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। आपकी…"
Sunday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"हार्दिक धन्यवाद आभार आपका लक्ष्मण भाईजी"
Sunday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"हार्दिक धन्यवाद लक्ष्मण भाई "
Sunday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी आदरणीय अशोक भाईजी  चौपाई में चित्र का  सम्पूर्ण  चित्रण हुआ है।…"
Sunday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"चप्पल उसकी सिली न जाती। बिन चप्पल के वह रह जाती।।....वाह ! वाह ! प्रदत्त चित्र की आत्मा का भाव आपने…"
Sunday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service