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चाहा ये दिल तेरा पाना हम को।
महका के राहों को जाना हम को।

कहते कोई तो अफ़साना हम भी,
कैसे बुनता ताना बाना हम को।

आये जाये मिलकर बैठे बिछड़ें,
कहना जो भी होता पाना हम को।

कैसा होगा अब ये हम का जीना,
जब राहों इन आना जाना हम को।

औरत बन के तुझको भी आना होगा,
क्यूँ होता इलजाम निभाना हम को।

  1. मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Neelam Upadhyaya on July 9, 2018 at 1:51pm

आदरणीय  मोहन बेगोवाल जी, नमस्कार ।  अच्छी ग़ज़ल की पेशकश के लिए बधाई । 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 8, 2018 at 5:07pm

आ. मोहन जी, अच्छी गजल हुयी है , हार्दिक बधाई ।

Comment by Mohan Begowal on July 8, 2018 at 2:51pm

 आदरनीय समर जी और दोस्तो बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on July 8, 2018 at 2:41pm

जनाब मोहन बेगोवाल। जी आदाब,बह्र-ए-मीर पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।

आपकी ग़ज़ल बह्र के हिसाब से ठीक है,लेकिन इस बह्र में ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि बह्र के साथ मिसरों का लय में होना भी ज़रूरी है और उसके साथ शिल्प की पकड़ भी मज़बूत होना चाहिए,शिल्प और लय के हिसाब से आपके मिसरे कमज़ोर लगे,इस ओर ध्यान देंगे तो ये कमज़ोरी भी दूर हो जायेगी,प्रयासरत रहें ।

Comment by Mohammed Arif on July 8, 2018 at 9:47am

आदरणीय मोहन बेगोवाल जी आदाब,

                        ग़ज़ल का बहुत ही बेहतरीन प्रयास । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

Comment by नाथ सोनांचली on July 8, 2018 at 9:23am

आद0 मोहन बोगोवाल जी सादर अभिवादन। ग़ज़ल का बढिया प्रयास है। गुणीजनों के इस्लाह की प्रतीक्षा कीजिये

 मेरी बधाई स्वीकार करें।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on July 7, 2018 at 11:06pm

बहुत बढ़िया ग़ज़ल। हार्दिक बधाई आदरणीय मोहन बेगोवाल साहिब । मुझे ऐसा लगा कि कुछ अशआर में सम्मानित गुरुुजन इस्लाह देेेना चाहेंंगे।

Comment by TEJ VEER SINGH on July 7, 2018 at 6:59pm

हार्दिक बधाई आदरणीय मोहन बेगोवाल जी । बेहतरीन गज़ल।

कहते कोई तो अफ़साना हम भी,
कैसे बुनता ताना बाना हम को।

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