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जो गिरफ़्तार है जुल्फों में वो फरार कहाँ


2122 1122 1212 22


इक ज़माने से गुलिस्ताँ में है बहार कहाँ ।
जान करता है गुलों पर कोई निसार कहाँ ।।

बारहा पूछ न मुझसे मेरी कहानी तू ।
अब  तुझे  मेरी  सदाक़त पे ऐतबार कहाँ ।।

एक मुद्दत से कज़ा का हूँ मुन्तजिर साहब ।
मौत पर मेरा अभी तक है इख़्तियार कहाँ ।।

आपकी थी ये बड़ी भूल मान जाते हम ।
दिख रहे आप गुनाहों पे सोगवार कहाँ ।।

ख़ाब जुमलों से दिखाया न कीजिये इतना ।
आपकी बात में अब रह गई वो धार कहाँ ।।

जीत के जश्न में मदहोश हो गए जब से ।
आपके रंग का उतरा अभी खुमार कहाँ ।।

लद गये दिन वो सियासत के इस तरह साहब ।
कारवाँ आपका निकला मग़र गुबार कहाँ ।।

दफ़्न होती हैं यहाँ रोज  ख्वाहिशें सारी ।
ढूढ़िये मत मेरी हसरत की है मज़ार कहाँ ।।

रेत की तर्ह फिसलता है वक्त मुट्ठी से ।
अब मुहब्बत के लिए और इंतजार कहाँ ।।

लोग बेचैन हैं महफ़िल में आज फिर साकी ।
बिन तेरे बज़्म में आता यहाँ करार कहाँ ।।

अब तो क़ातिल की सजा पर हो फैसला कोई ।
जो गिरफ्तार है जुल्फों में वो फरार कहाँ ।।

          -नवीन मणि त्रिपाठी
          मौलिक अप्रकाशित










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Comment by Naveen Mani Tripathi on September 7, 2018 at 6:22pm

आ0 कबीर सर सादर नमन ।

महत्वपूर्ण इस्लाह के लिए तहेदिल से शुक्रिया ।

नमन 

Comment by Samar kabeer on September 7, 2018 at 6:03pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

ढूढ़िये मत मेरी हसरत की है मज़ार कहाँ'

"मज़ार" शब्द पुल्लिंग है,'की' को "का" करलें ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on September 7, 2018 at 4:48pm

आ0 शर्मा जी ग़ज़ल तक आने के लिए हार्दिक आभार 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 7, 2018 at 1:09pm

आदरणीय नवीन जी, शुभ प्रभातम, बहुत खूब गजल हुई है , बधाई आपको 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 7, 2018 at 11:18am

आ. भाई नवीन जी, सादर अभिवादन । बेहतरीन गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on September 7, 2018 at 10:40am

आ0 तेज वीर सिंह साहब तहेदिल से शुक्रिया ।

Comment by TEJ VEER SINGH on September 7, 2018 at 9:54am

हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि जी।बेहतरीन गज़ल।

ख़ाब जुमलों से दिखाया न कीजिये इतना ।
आपकी बात में अब रह गई वो धार कहाँ ।।

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