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सिद्धिर्भवति कर्मजा-----ग़ज़ल

22 122 12

गीता में लिक्खा गया
सिद्धिर्भवति कर्मजा

बिन फल की चिंता करे
सद्कर्म करिए सदा

दिखता है जो कुछ यहाँ
सब खेल है काल का

ऊर्जा का सिद्धांत है
लक्षण है जो आत्म का

बदले हैं बस रूप ही
ऊर्जा हो या आत्मा

मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 11, 2018 at 9:46am

आदरणीय अजय सर बहुत आभार

Comment by Ajay Tiwari on October 10, 2018 at 5:25pm

आदरणीय पंकज जी, अच्छे अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई.

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 10, 2018 at 3:24pm

आदरणीय सन्तोष जी सादर आभार

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 10, 2018 at 3:24pm

आदरणीय बाऊ जी सादर प्रणाम। गजल को आशीर्वाद देने के लिए हार्दिक आभार

Comment by santosh khirwadkar on October 9, 2018 at 11:49pm

आदरणीय पंकज जी ,शानदार ग़ज़ल हुई, बधाई!!

Comment by Samar kabeer on October 9, 2018 at 2:36pm

अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 9, 2018 at 12:42pm

आदरणीय आरिफ़ सर सादर अभिवादन। ग़ज़ल को अपना आशीर्वाद प्रदान करने के लिए आपको सादर आभार

Comment by Mohammed Arif on October 9, 2018 at 11:42am

आदरणीय पंकज जी आदाब,

                           बड़ा अच्छा प्रयोग । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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