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नए आयाम ....

मुझे
नहीं सुननी
कोई आवाज़
मैंने अपने अन्तस् से
हर आवाज़ के साथ जुड़े हुए
अपनेपन की अनुभूति को
तम की काली कोठरी में
दफ़्न कर दिया है
अपनेपन का बोध
कब का मिटा दिया है
अपनेपन की सारी निधियाँ
लुटा चुका हूँ
अब तो मैं
किसी स्मृति का अवशेष हूँ
आवाज़ों के मोह बंधन में
मुझे मत बाँधो
हम दोनों के मन
एक दूसरे की अनुभूतियों के
अव्यक्त स्वरों से
गुंजित हैं
आवाज़ों को चिल्लाने दो
हम तुम
गति हैं
जीवन की
रुकना
अभिशाप है
आवाज़ों के मोह बंधन में
स्वयं को मत बांधो
गति का काम
चलना है
न मुझे रोको
न स्वयं रुको
बढ़ो और जीवन को
नए आयाम दे दो
स्मृति अवशेषों को
नया नाम दे दो


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 522

Comment

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Comment by Sushil Sarna on October 26, 2018 at 6:13pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन पर आपकी मधुर प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on October 26, 2018 at 6:13pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब .. सर सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on October 26, 2018 at 6:12pm

आदरणीय Sheikh Shahzad Usmani जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 25, 2018 at 2:12am

आ. भाई सुशील जी, अच्छी रचना हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on October 24, 2018 at 3:37pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 23, 2018 at 3:59am

बहुत सुंदर और विचारोत्तेजक/प्रेरक सृजन हेतु सादर हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना साहिब।

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