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मुझे विरासत में मिलीं
कुछ हथौड़ियाँ
कुछ छेनियाँ
मिला थोड़ा-सा धैर्य
कुछ साहस
थोड़ा-सा हुनर

मैं तराशने लगा
निर्जीव पत्थरों को

बना दिया
सुंदर-सुंदर मूर्तियाँ
जो कई अर्थों में
श्रेष्ठ हैं
ईश्वर द्वारा बनायी गयीं
सजीव मूर्तियों से
जिन्हें नहीं पता रिश्तों की मर्यादा
नही कर पातीं ये भेद
दूधमुँही बच्चियों, युवतियों और वृद्ध महिलाओं में

काश
एक अदद कलम
मुझे मिली होती
विरासत में

मैं होता
एक न्यायाधीश
लिखता निर्विघ्न फैसला
उन बलात्कारियों का
और तोड़ देता निब को

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 25, 2018 at 10:33pm

सराहना हेतु दिल से आभार आदरणीय बृजेश कुमार ब्रज जी.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 25, 2018 at 10:09pm

आदरणीय तेजवीर सिंह जी, आपसे प्रतिक्रिया पाकर कविता सार्थक हुई, बहुत बात आभार।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 25, 2018 at 10:08pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी, उत्साहवर्धन करती आपकी प्रतिक्रिया हेतु बहुत  आभार। 

Comment by Shlesh Chandrakar on October 25, 2018 at 8:41pm

बहुत खूब वाह वाह


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 25, 2018 at 7:06pm

आदरणीय जनाब समर कबीर साहब, सादर प्रणाम, आपको कविता पसंद आयी, लेखन सफल हुआ, उर्दू शब्दों के बारे जानकारी अल्प है इसलिए गलती हुई, मायनों के स्थान पर अर्थों लिखना क्या उचित होगा ? सुझाव दें तो मैं पोस्ट एडिट कर लेता हूँ ।

Comment by Samar kabeer on October 25, 2018 at 3:58pm

जनाब गणेश जी "बाग़ी" साहिब आदाब,बहुत उम्दाअतुकान्त कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'  जो कई मायनों में'

इस पंक्ति में 'मायनों' कोई शब्द ही नहीं है,सहीह शब्द है "मा'ना" और इसका बहुवचन है "मआनी" देखियेगा ।

Comment by Ram Ashery on October 25, 2018 at 3:15pm

माननीय बागी जी आपको बहुत बहुत बधाई स्वीकार हो इस सुंदर अभिव्यकित के लिए 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 25, 2018 at 2:28pm

समसामयिक ज्वलंत मुद्दों और स्व-चिंतन पर बेहतरीन विचारोत्तेजक सृजन हेतु तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब इंजी. गणेश जी बाग़ी साहिब। निर्जीव मूर्तियों से कमतर सजीव पत्थर-दिल वाले आपराधिक प्रवृत्ति के नर-मानव पर बेहतरीन शब्द-बाण।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 25, 2018 at 12:34pm

वाह आदरणीय बहुत ही सार्थक भावपूर्ण कविता का सृजन है..

Comment by TEJ VEER SINGH on October 25, 2018 at 9:07am

हार्दिक बधाई आदरणीय गणेश जी बागी साहब जी।बेहतरीन कविता।

काश
एक अदद कलम
मुझे मिली होती 
विरासत में

मैं होता
एक न्यायाधीश
लिखता निर्विघ्न फैसला
उन बलात्कारियों का
और तोड़ देता निब को

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